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टीकमगढ़ (मध्य प्रदेश) । भ्रष्ट अधिकारियों की मनमानी से परेशान होकर अक्सर लोग हथियार डाल देते हैं, लेकिन टीकमगढ़ में एक ऐसा अनोखा मामला सामने आया है। जहां किसान ने तहसीलदार को जमीन नामांतरण के नाम पर 50 हजार रुपए रिश्वत तो दे दी, लेकिन जब तहसीलदार ने दोबारा 50 हजार रिश्वत की मांग की तो किसान गांधीगिरी पर उतर आया और तहसीलदार की गाड़ी से अपनी भैंस बांध दी और हाथ जोड़ लिए कि अब उसके पास देने के लिए कुछ नहीं बचा है। वहीं जिलाधिकारी ने मामले की जांच एसडीएम को सौंप दी है।
किसान लक्ष्मी यादव टीकमगढ़ जिले की खरगापुर तहसील के देवपुर गांव का रहने वाला है। लक्ष्मी यादव का कहना है कि उसने अपनी दो बहुओं के नाम पर जमीन खरीदी थी और जमीन के नामांतरण और राजस्व पुस्तिका बनवाने के लिए तहसीलदार के कार्यालय में आवेदन दिया । पटवारी ने पंजी भर दी, लेकिन तहसीलदार सुनील वर्मा ने नामांतरण का काम लटका दिया। और बोले केस चलाओ, प्रकरण पेश करो, बाद में नामांतरण की कार्रवाई होगी। इस दौरान लक्ष्मण यादव से 50 हजार रुपए रिश्वत की मांग की गई।
किसान का आरोप है कि तहसीलदार ने उससे पहले 50 हजार की रिश्वत मांगी, जो उसने दे दी। इसके बाद में फिर दोबारा रिश्वत की मांग की गई। अब उसके पास पैसे नहीं थे, लिहाजा उसने 50 हजार रुपए की रिश्वत के एवज में तहसीलदार की जीप से ही भैंस बांध दी ताकि उसके द्वारा खरीदी गई जमीन का नामांतरण हो जाए और पुस्तिका मिल जाए। इससे तहसीलदार बौखला गए। और काम जल्दी करने का वादा किया। जब बात नहीं बनी तो पुलिस बुला ली। पुलिस ने भैंस को तो गाड़ी से छुड़ाकर पेड़ से बांध दी, लेकिन इस हंगामे से तहसीलदार आफत में फंस गए।
हालांकि कलेक्टर ने बल्देवगढ़ एसडीएम वंदना राजपूत को मामले की जांच सौंप दी है। कलेक्टर सौरभ कुमार सुमन का कहना है कि अगर आरोप सही पाए जाते हैं तो तत्काल कार्रवाई की जाएगी। वंदना राजपूत ने बताया कि संबंधित किसान की जमीन का मामला दो गांव का है उसके दो नामांतरण के मामले है, इनमें से एक का लोक अदालत में निपटारा हो चुका है और दूसरे मामले में उसे सलाह दी गई है कि वह पृथक से नामांतरण के लिए प्रकरण दर्ज कराएं। वहीं तहसीलदार सुनील वर्मा का कहना है कि किसान द्वारा लगाए गए आरोप बेबुनियाद हैं। अब देखना है कि किसान की गांधीगिरी भ्रष्टाचार के खिलाफ क्या रंग लाती है।
चंडीगढ़ (हरियाणा)। 'प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि' का लाभ पाने को लेकर जारी भ्रम को दूर करते हुए मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने हरियाणा विधानसभा में स्थिति साफ की। उन्होंने कहा कि 'प्रधानमंत्री सम्मान निधि' योजना का लाभ केवल उन्हीं किसानों को मिलेगा, जिनके पास पांच एकड़ तक जमीन है। इससे अधिक जमीन रखने वाले किसान इस योजना के दायरे में नहीं आएंगे। इस योजना के लिए किसानों का पंजीकरण शुरु कर दिया गया है। हरियाणा पहला राज्य होगा, जहां किसानों को योजना का सबसे पहले लाभ मिलेगा। प्रधानमंत्री 24 फरवरी को इस योजना का शुभारंभ करेंगे।
आपको बता दें कि विधानसभा में बजट सत्र के दौरान नेता विपक्ष अभय सिंह चौटाला ने गुरुवार को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि में करीब साढ़े पांच लाख किसानों को कवर नहीं किए जाने का आरोप लगाया और सरकार से मांग की वह इस पर स्थिति स्पष्ट करे। इसके बाद मुख्यमंत्री ने सदन में जबाब दिया कि पांच एकड़ से अधिक जमीन वाले किसान छह हजार रुपये सालाना की इस योजना में शामिल नहीं होंगे। इसके अलावा पट्टे पर खेती करने वाले और अठारह साल से कम उम्र के किसानों को भी इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा ।
मुख्यमंत्री के जवाब से पहले अभय सिंह चौटाला ने केंद्र सरकार की इस योजना पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस योजना का किसानों को कोई लाभ नहीं होने वाला है। चौटाला ने सरकार से तेलंगाना सरकार की तरह हर वर्ष किसानों को 4000 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से बिजाई खर्च दिए जाने की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में करीब 16 लाख किसान हैं , मगर सरकार लाभ साढ़े 10 लाख को दे रही है। सरकार यदि चाहे तो अपने स्तर पर यह लाभ उन किसानों को दे सकती है। अब देखना ये होगा कि खट्टर सरकार बाकी किसानों के लिए क्या कदम उठाती है।
रांची (झारखंड) । अपनी सात सूत्री मांग को लेकर पुलिसकर्मियों ने आंदोलन के दूसरे चरण में बुधवार से भूख हड़ताल शुरु कर दी। झारखंड के 70 हजार पुलिसकर्मी भूखे पेट अपनी ड्यूटी पर हैं। झारखंड पुलिस एसोसिएशन, झारखंड पुलिस मेंस एसोसिएशन व झारखंड पुलिस चतुर्थवर्गीय कर्मचारी संघ के आह्वान पर पुलिसकर्मियों ने दिनभर खाना न खाकर आंदोलन को जारी रखने का प्रण लिया है। इसमें प्रदेश के चतुर्थवर्गीय पुलिसकर्मी से लेकर इंस्पेक्टर स्तर तक के पदाधिकारी शामिल हैं।
झारखंड पुलिस एसोसिएशन, झारखंड पुलिस मेंस एसोसिएशन व झारखंड पुलिस चतुर्थवर्गीय कर्मचारी संघ के कर्मचारी सात सूत्री मांग को लेकर भूखे पेट ड्यूटी कर अपना विरोध जता रहे हैं। और उपवास पर रहकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ताकि उनकी मांगों पर सरकार की ओर से सहानूभूतिपूर्वक विचार करे। पुलिसकर्मियों की मांग है कि सीमित विभागीय प्रतियोगिता परीक्षा नियमावली को बिना कोई परीक्षा लिए समाप्त किया जाए। 13 माह का वेतन देने के आश्वासन को पूरा किया जाए। सातवें वेतन आयोग की अनुशंसा के अनुरूप पुलिसकर्मियों के भत्तों को पुनरीक्षित दर से दिया जाय। एसीपी-एमएसीपी मामले का शीघ्र निपटारा किया जाए एवं इसकी गणना नियुक्ति की तिथि से की जाए। शहीद-मृत पुलिसकर्मियों के आश्रित को नौकरी के लिए अधिकतम उम्र सीमा को शिथिल करने की छूट और आश्रित परिजन को मिलने वाली राशि में से 25 फीसद उनके माता-पिता को दी जाए। नई पेंशन नियमावली की जगह पुरानी पेंशन योजना लागू की जाए। वरीय पुलिस पदाधिकारी की तरह ही कनीय पुलिस पदाधिकारियों व कर्मियों को भी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराया जाए व इसकी नियमावली को सरल बनाया जाए। पुलिसकर्मियों का कहना है कि यदि फिर भी उनकी मांगों पर विचार नहीं किया गया तो 28 फरवरी से 4 मार्च तक तीनों संघों के बैनर तले सभी पुलिसकर्मी पांच दिवसीय सामूहिक अवकाश पर चले जाएंगे।
आपको बता दें कि पुलिसकर्मियों ने अपनी मांगों को लेकर प्रथम चरण में 12 फरवरी से 14 फरवरी तक काला बिल्ला लगाकर ड्यूटी की थी। लेकिन अब तक उनकी मांगों पर सरकार ने कोई विचार नहीं किया। अब देखने वाली बात यह होगी कि आगे झारखंड पुलिस की सात सूत्री मांग और आंदोलन पर झारखंड सरकार का क्या कदम उठाती है।
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)। आपने गरीब और कमजोर लोगों को पुलिस की मनमानी के चलते परेशान और रोते हुए बहुत देखा होगा। ताजा मामला उत्तर प्रदेश विधानसभा का है, जहां पुलिस की मनमानी से परेशान एक विधायक सदन में फूट-फूटकर रोने लगे। उनको रोता देख विधानसभा के सभी सदस्य दंग रह गए। भावुक विधायक का कहना था कि उनका दस लाख रुपया चोरी हो गया है, लेकिन पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं कर रही है। अगर चोरी की रकम उन्हें वापस नहीं मिली तो वह आत्महत्या कर लेंगे।
विधायक कल्पनाथ पासवान आजमगढ़ के मेहनगर से समाजवादी पार्टी के विधायक हैं। कल्पनाथ पासवान ने बताया कि उन्होंने अपना घर बनवाने के लिए अपने लखनऊ के बैंक खाते से दस लाख रुपये निकाले । ये रुपये लेकर वह बस से आजमगढ़ पहुंचे थे, जहां वह शारदा चौक पर स्थित एक होटल में चाय पीने लगे। जब उन्होंने होटल से निकलते समय नोटों से भरा अपना बैग उठाया तो उन्हें बैग कुछ हल्का लगा। उन्होंने बैग खोला तो उसमें से रुपये गायब थे। इसके बाद उन्होंने पुलिस थाने में चोरी की शिकायत की, लेकिन पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया। विधायक का आरोप है कि जब पुलिस ने उनकी नहीं सुनी तो उन्होंने मामले की शिकायत पुलिस अधीक्षक से की। पुलिस अधीक्षक के कहने के बाद पुलिस की एक टीम ने कुछ लोगों से पूछताछ की, लेकिन दस लाख रुपये चोरी की एफआईआर दर्ज नहीं की गई।
पुलिस द्वारा डेढ़ महीने बाद चोरी की रिपोर्ट नहीं लिखे जाने से परेशान विधायक कल्पनाथ पासवान मंगलवार को विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित के सामने रोने लगे। वह खूब देर तक रोते रहे। उन्होंने कहा कि उनका दस लाख रुपया चोरी हो गया है, लेकिन पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं कर रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब एक विधायक के साथ पुलिस का ऐसा बर्ताव है तो फिर आम आदमी के साथ यूपी पुलिस क्या करती होगी। विधानसभा अध्यक्ष से विधायक कल्पनाथ पासवान ने कहा कि न्याय दिलाएं, नहीं तो मर जाऊंगा। विधायक ने रोते हुए कहा कि मेरे साथ न्याय कीजिए। मुझे अगर न्याय नहीं मिला तो मैं निश्चित रूप से मर जाऊंगा...। आज मैं रो रहा हूं सदन में, कल पूरा सदन रोएगा। मान्यवर न्याय करिए। मैं पूरे सदन से विनती हाथ जोड़कर विनती कर रहा हूं। मैं कहा जाऊं। मैं पूरे सदन से कह रहा हूं... मान्यवर मैं जिंदा नहीं रहूंगा। मान्यवर मैं गरीब किसान हूं। मेरा रुपया दिलवा दीजिए, वर्ना मैं मर जाऊंगा मान्यवर।
हालांकि संसदीय कार्य मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने विधायक को भरोसा दिलाया कि वह मामले की रिपोर्ट मंगाएंगे और न्याय सुनिश्चित होगा। उन्होंने कहा कि अगर विधायक चाहते हैं तो एफआईआर दर्ज की जाएगी।
रायपुर (छत्तीसगढ़)। निर्वाचन आयोग ने आगामी लोकसभा चुनाव के दौरान धन के दुरूपयोग को रोकने के लिए कमर कस ली है। इसके लिए लोकसभा निर्वाचन 2019 के दौरान निर्वाचन व्यय निगरानी के लिए टीमें तैनात रहेंगी। ये टीमें प्रत्याशी की हर राजनीतिक गतिविधि पर नजर रखेंगी। कोई भी आम नागरिक निर्वाचन कार्यालय में सिर्फ 1 रुपए जमा करके प्रत्याशी के निर्वाचन व्यय की जानकारी देख सकता है।
रायपुर में मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय में सभी जिलों के निर्वाचन व्यय निगरानी के नोडल अधिकारियों एवं मास्टर ट्रेनरों को प्रशिक्षण दिया गया। मास्टर ट्रेनर पुलक भट्टाचार्य ने बताया कि निर्वाचन के दौरान व्यय निगरानी दल राजनीतिक दलों तथा प्रत्याशी के प्रचार-प्रसार और उनके द्वारा किए जा रहे जनसम्पर्क के विभिन्न् माध्यमों तथा उसके लिए किए जा रहे उपक्रमों के व्यय का लेखा-जोखा तैयार करेगी। ये व्यय निगरानी दल निर्वाचन क्षेत्र के लिए गठित वीडियो निगरानी दल, वीडियो अवलोकन दल, लेखा दल, स्थैतिक निगरानी दल, एमसीसी, एमसीएमसी तथा नियंत्रण कक्ष के सहयोग तथा समन्वय से काम करेगा।
लोकसभा निर्वाचन के लिए कोई भी अभ्यर्थी 70 लाख स्र्पये व्यय कर सकता है। व्यय निगरानी दल हर उस संदिग्ध लेनदेन, परिवहन तथा व्यवहार पर नजर रखेंगे, जो निष्पक्ष निर्वाचन के किसी भी पक्ष को प्रभावित कर सकता है। प्रत्याशी के किसी भी व्यय पर मतभेद अथवा विवाद की स्थिति में जिला व्यय निगरानी समिति जिसके प्रमुख व्यय प्रेक्षक होते हैं, उनके समक्ष पक्ष रखा जा सकता है। मास्टर ट्रेनर श्रीकांत वर्मा ने बताया कि प्रत्याशी के प्रतिदिन की राजनीतिक गतिविधि की रिकार्डिंग वीडियो निगरानी दल करता है। जिसकी प्रतिलिपि 300 स्र्पये देकर कोई भी नागरिक ले सकता है।
अधिकार एक्सप्रेस ब्यूरो
रायपुर (छत्तीसगढ़)। निर्वाचन आयोग ने आगामी लोकसभा चुनाव के दौरान धन के दुरूपयोग को रोकने के लिए कमर कस ली है। इसके लिए लोकसभा निर्वाचन 2019 के दौरान निर्वाचन व्यय निगरानी के लिए टीमें तैनात रहेंगी। ये टीमें प्रत्याशी की हर राजनीतिक गतिविधि पर नजर रखेंगी। कोई भी आम नागरिक निर्वाचन कार्यालय में सिर्फ 1 रुपए जमा करके प्रत्याशी के निर्वाचन व्यय की जानकारी देख सकता है।
रायपुर में मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय में सभी जिलों के निर्वाचन व्यय निगरानी के नोडल अधिकारियों एवं मास्टर ट्रेनरों को प्रशिक्षण दिया गया। मास्टर ट्रेनर पुलक भट्टाचार्य ने बताया कि निर्वाचन के दौरान व्यय निगरानी दल राजनीतिक दलों तथा प्रत्याशी के प्रचार-प्रसार और उनके द्वारा किए जा रहे जनसम्पर्क के विभिन्न् माध्यमों तथा उसके लिए किए जा रहे उपक्रमों के व्यय का लेखा-जोखा तैयार करेगी। ये व्यय निगरानी दल निर्वाचन क्षेत्र के लिए गठित वीडियो निगरानी दल, वीडियो अवलोकन दल, लेखा दल, स्थैतिक निगरानी दल, एमसीसी, एमसीएमसी तथा नियंत्रण कक्ष के सहयोग तथा समन्वय से काम करेगा।
लोकसभा निर्वाचन के लिए कोई भी अभ्यर्थी 70 लाख स्र्पये व्यय कर सकता है। व्यय निगरानी दल हर उस संदिग्ध लेनदेन, परिवहन तथा व्यवहार पर नजर रखेंगे, जो निष्पक्ष निर्वाचन के किसी भी पक्ष को प्रभावित कर सकता है। प्रत्याशी के किसी भी व्यय पर मतभेद अथवा विवाद की स्थिति में जिला व्यय निगरानी समिति जिसके प्रमुख व्यय प्रेक्षक होते हैं, उनके समक्ष पक्ष रखा जा सकता है। मास्टर ट्रेनर श्रीकांत वर्मा ने बताया कि प्रत्याशी के प्रतिदिन की राजनीतिक गतिविधि की रिकार्डिंग वीडियो निगरानी दल करता है। जिसकी प्रतिलिपि 300 स्र्पये देकर कोई भी नागरिक ले सकता है।
अधिकार एक्सप्रेस ब्यूरो
चंडीगढ़ (हरियाणा)। असंगठित क्षेत्र में लगे 18 से 40 साल के श्रमिकों के लिए राहत की खबर है। 15 फरवरी से प्रधानमंत्री श्रम योगी मान धन योजना लागू कर दी गई है। इस योजना के तहत 60 वर्ष की आयु पूरी करने वाले श्रमिकों को तीन हजार रुपये मासिक पेंशन का लाभ मिलेगा। अपनी उम्र के हिसाब से मासिक अंशदान कर कोई भी श्रमिक इस योजना में शामिल हो सकेगा। हालांकि नेशनल पेंशन स्कीम, राज्य कर्मचारी बीमा या कर्मचारी भविष्य निधि योजना के तहत पंजीकृत श्रमिक इस योजना के पात्र नहीं होंगे। इस योजना के लिए पंजीकरण शुरू हो गया है।
प्रधानमंत्री श्रम योगी मान धन (पीएमएसवाईएम) पेंशन योजना के तहत 15 हजार रुपये तक मासिक कमाई वाले गृह आधारित श्रमिक, गली में फेरी लगाने वाले, मध्याह्न भोजन श्रमिक, सिर पर बोझा उठाने वाले, ईट भट्ठा श्रमिक, मोची, कूड़ा बीनने वाले, घरेलू श्रमिक, धोबी, रिक्शा चालक, ग्रामीण भूमिहीन श्रमिक, ऑन अकाउंट श्रमिक, कृषि श्रमिक, संनिर्माण श्रमिक, बीड़ी श्रमिक, हथकरघा श्रमिक, चमड़ा श्रमिक, दृश्य-श्रव्य श्रमिक के रूप में एवं ऐसे ही अन्य व्यवसायों में कार्य करने वाले शामिल हैं।
इस योजना के तहत 18 साल के श्रमिक को हर महीने 55 तो 29 साल के श्रमिक को 100 और 40 साल के श्रमिकों को 200 रुपये का अंशदान देना होगा। उनके खाते में इतनी ही राशि केंद्र सरकार डलवाएगी। 60 साल की उम्र से पहले अगर श्रमिक की मौत हो जाती है तो उसके जीवन साथी को उसी अंशदान के साथ योजना जारी रखने का हक मिलेगा। हालांकि मृतक का जीवनसाथी चाहे तो श्रमिक द्वारा उस समय तक दिया गया अंशदान लेकर योजना से बाहर निकल सकता है। यदि पेंशन भोगी की मौत हो जाती है तो उसके जीवन साथी को आधी पेंशन मिलती रहेगी। योजना से जुडऩे के इच्छुक श्रमिक कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी) में आधार कार्ड, बैंक पासबुक व आइएफएससी कोड के साथ अपना पंजीकरण करवा सकता है।
अधिकार एक्सप्रेस ब्यूरो
चंडीगढ़ (हरियाणा)। असंगठित क्षेत्र में लगे 18 से 40 साल के श्रमिकों के लिए राहत की खबर है। 15 फरवरी से प्रधानमंत्री श्रम योगी मान धन योजना लागू कर दी गई है। इस योजना के तहत 60 वर्ष की आयु पूरी करने वाले श्रमिकों को तीन हजार रुपये मासिक पेंशन का लाभ मिलेगा। अपनी उम्र के हिसाब से मासिक अंशदान कर कोई भी श्रमिक इस योजना में शामिल हो सकेगा। हालांकि नेशनल पेंशन स्कीम, राज्य कर्मचारी बीमा या कर्मचारी भविष्य निधि योजना के तहत पंजीकृत श्रमिक इस योजना के पात्र नहीं होंगे। इस योजना के लिए पंजीकरण शुरू हो गया है।
प्रधानमंत्री श्रम योगी मान धन (पीएमएसवाईएम) पेंशन योजना के तहत 15 हजार रुपये तक मासिक कमाई वाले गृह आधारित श्रमिक, गली में फेरी लगाने वाले, मध्याह्न भोजन श्रमिक, सिर पर बोझा उठाने वाले, ईट भट्ठा श्रमिक, मोची, कूड़ा बीनने वाले, घरेलू श्रमिक, धोबी, रिक्शा चालक, ग्रामीण भूमिहीन श्रमिक, ऑन अकाउंट श्रमिक, कृषि श्रमिक, संनिर्माण श्रमिक, बीड़ी श्रमिक, हथकरघा श्रमिक, चमड़ा श्रमिक, दृश्य-श्रव्य श्रमिक के रूप में एवं ऐसे ही अन्य व्यवसायों में कार्य करने वाले शामिल हैं।
इस योजना के तहत 18 साल के श्रमिक को हर महीने 55 तो 29 साल के श्रमिक को 100 और 40 साल के श्रमिकों को 200 रुपये का अंशदान देना होगा। उनके खाते में इतनी ही राशि केंद्र सरकार डलवाएगी। 60 साल की उम्र से पहले अगर श्रमिक की मौत हो जाती है तो उसके जीवन साथी को उसी अंशदान के साथ योजना जारी रखने का हक मिलेगा। हालांकि मृतक का जीवनसाथी चाहे तो श्रमिक द्वारा उस समय तक दिया गया अंशदान लेकर योजना से बाहर निकल सकता है। यदि पेंशन भोगी की मौत हो जाती है तो उसके जीवन साथी को आधी पेंशन मिलती रहेगी। योजना से जुडऩे के इच्छुक श्रमिक कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी) में आधार कार्ड, बैंक पासबुक व आइएफएससी कोड के साथ अपना पंजीकरण करवा सकता है।
अधिकार एक्सप्रेस ब्यूरो
जयपुर (राजस्थान)। देश में पहली बार अशोक गहलोत सरकार 'सामाजिक जवाबदेही' कानून लाने जा रही है। इस कानून के तहत लापरवाह अफसरों पर शिकंजा कसने की तैयारी है। इसके लिए राजस्थान सरकार ने 'सामाजिक जवाबदेही विधेयक' तैयार कर लिया है। इसके बारे में आम जनता से 15 दिन के भीतर विधेयक पर आपत्ति एवं सुझाव मांगे गए हैं।
अशोक गहलोत सरकार का दावा है कि राजस्थान यह कानून बनाने वाले देश का पहला प्रदेश होगा। इस कानून के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह का यह अधिकार है कि उन्हें एक निश्चित समयसीमा के भीतर निर्धारित मात्रा और गुणवत्ता में चिह्नित सेवाएं मुहैया कराई जाएं और उनकी शिकायतों का निवारण किया जाए। इसमें सुनवाई अथवा काम कम होने पर जुर्माने का प्रवधान किया गया है। सभी प्रकार की शिकायत एक जगह पर दर्ज करने की भी सुविधा होगी। इसमें स्वतंत्र जांच का कानूनी प्रावधान किया गया है । जिला एवं संभाग स्तर पर जन सुनवाई हो सकेगी । शिकायत का 30 दिन के अंदर निस्तारण करने का भर प्रावधान किया गया है । इस कानून में यह तय किया जाएगा कि किसी व्यक्ति की फाइल को क्यों रोका गया , किसी की पेंशन को क्यों बंद किया गया और किस अधिकारी ने फाइल को बंद किया। सरकारी अधिकारी निस्तारित सेवाओं का पूरा ब्योरा और जॉब चार्ट भी जारी करेगा, जिसमें इस बात का उल्लेख होगा कि किस अधिकारी को कौनसी जिम्मेदारी दी गई और उस जिम्मेदारी का निर्वहन वो कितनी तत्परता और कुशलता से कर पाया। सुनवाई के अधिकार के तहत बूथ स्तर पर सार्वजनिक सुनवाई होगी, जिसमें शिकायतकर्ता अपनी बात रख सकेंगें। ड्राफ्ट की प्रति विभाग की वेबसाइट पर अपलोड कर दी गई है ।
अधिकार एक्सप्रेस ब्यूरो
जयपुर (राजस्थान)। देश में पहली बार अशोक गहलोत सरकार 'सामाजिक जवाबदेही' कानून लाने जा रही है। इस कानून के तहत लापरवाह अफसरों पर शिकंजा कसने की तैयारी है। इसके लिए राजस्थान सरकार ने 'सामाजिक जवाबदेही विधेयक' तैयार कर लिया है। इसके बारे में आम जनता से 15 दिन के भीतर विधेयक पर आपत्ति एवं सुझाव मांगे गए हैं।
अशोक गहलोत सरकार का दावा है कि राजस्थान यह कानून बनाने वाले देश का पहला प्रदेश होगा। इस कानून के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह का यह अधिकार है कि उन्हें एक निश्चित समयसीमा के भीतर निर्धारित मात्रा और गुणवत्ता में चिह्नित सेवाएं मुहैया कराई जाएं और उनकी शिकायतों का निवारण किया जाए। इसमें सुनवाई अथवा काम कम होने पर जुर्माने का प्रवधान किया गया है। सभी प्रकार की शिकायत एक जगह पर दर्ज करने की भी सुविधा होगी। इसमें स्वतंत्र जांच का कानूनी प्रावधान किया गया है । जिला एवं संभाग स्तर पर जन सुनवाई हो सकेगी । शिकायत का 30 दिन के अंदर निस्तारण करने का भर प्रावधान किया गया है । इस कानून में यह तय किया जाएगा कि किसी व्यक्ति की फाइल को क्यों रोका गया , किसी की पेंशन को क्यों बंद किया गया और किस अधिकारी ने फाइल को बंद किया। सरकारी अधिकारी निस्तारित सेवाओं का पूरा ब्योरा और जॉब चार्ट भी जारी करेगा, जिसमें इस बात का उल्लेख होगा कि किस अधिकारी को कौनसी जिम्मेदारी दी गई और उस जिम्मेदारी का निर्वहन वो कितनी तत्परता और कुशलता से कर पाया। सुनवाई के अधिकार के तहत बूथ स्तर पर सार्वजनिक सुनवाई होगी, जिसमें शिकायतकर्ता अपनी बात रख सकेंगें। ड्राफ्ट की प्रति विभाग की वेबसाइट पर अपलोड कर दी गई है ।
अधिकार एक्सप्रेस ब्यूरो
बिजनौर (उत्तर प्रदेश)। प्रदेश में चुनाव के दौरान हर पार्टी सत्ता में आने के बाद किसानों के गन्ने का बकाया भुगतान दिलवाने का जोर शोर से वादा करती है, लेकिन सत्ता पाने के बाद उसके वादे मजाक साबित होते हैं। सोमवार को बिजनौर में गन्ने का बकाया भुगतान न मिलने से आहत होकर किसानों ने डीएम दफ्तर के सामने चिता सजाकर आत्मदाह करने की कोशिश की। इस दौरान किसानों और पुलिस बल के बीच लकड़ियों को लेकर छीना-झपटी होने लगी। जिसके बाद पुलिस ने किसानों को दौड़ा-दौड़ाकर लाठियों से पीटा। पुलिस की इस बर्बर कार्रवाई में 50 से ज्यादा किसान घायल हो गए, जबकि 10 किसानों को हिरासत में लिया गया है। वहीं, लाठीचार्ज के दौरान गिरने से एसपी सिटी लक्ष्मी निवास भी घायल हो गए।
आपको बता दें कि वेव ग्रुप की बिजनौर जिले के बिजनौर एवं चांदपुर चीनी मिल पर किसानों का पिछली पेराई सत्र का करीब 62 करोड़ रुपये गन्ना भुगतान बकाया है। किसानों के संगठन आजाद किसान यूनियन ने 3 फरवरी तक भुगतान न होने पर कलक्ट्रेट में आत्मदाह का एलान किया था। इस एलान के बाद रविवार को प्रशासनिक अधिकारियों और किसान नेताओं के बीच बातचीत को कोई नतीजा नहीं निकला। जिसके बाद किसान सोमवार सुबह 11 कलक्ट्रेट पहुंचे और डीएम दफ्तर के सामने लकड़ी की चिता सजानी शुरू कर दी। कुछ किसान लकड़ियों के ऊपर बैठ गए। इस दौरान लकडि़यां छीनने के प्रयास में पुलिस व किसानों में धक्का-मुक्की हुई। इसी बीच कुछ किसानों ने लकड़ियों में आग लगा दी। पुलिस ने पानी की बौछार की तो किसान और भड़क गए। इसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। किसान भी लकड़ियों से मुकाबला करने लगे। पुलिस ने आजाद किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौ. राजेंद्र सिंह समेत 10 किसान नेताओं को हिरासत में लिया और पुलिस लाइन ले आई। संगठन के जिलाध्यक्ष बिरेंद्र सिंह का कहना है कि लाठीचार्ज में कोई 50 किसान घायल हुए हैं। दो किसानों की हड्डी टूटी है, जबकि 16 किसान लापता हैं। वेव ग्रुप की चीनी मिलों ने अभी तक किसानों का बकाया गन्ना भुगतान नहीं किया है। वहीं जिले के डीएम अटल कुमार राय का कहना है कोई लाठीचार्ज नहीं किया गया है, सिर्फ आजाद किसान यूनियन कार्यकर्ताओं को आत्मदाह से रोका गया है। आत्मदाह की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती है। फिलहाल भारी पुलिस संख्या बल तैनात कर दिया गया है।
सागर (मध्य प्रदेश) । प्रदेश की कमलनाथ सरकार की किसानों को कर्जमाफी योजना कई किसान परिवारों के लिए आफत बन गयी है। इसको लेकर भारी संख्या में किसानों ने सरकार को आत्महत्या करने की धमकी दी है। किसानों का कहना है कि सरकार की कर्जमाफी सूची में उनका नाम शामिल किया गया है, जबकि उनके ऊपर कोई बकाया राशि नहीं है और न ही उन्होंने कोई कर्ज लिया है।
सागर जिले के हिलगन गांव में नाराज किसानों कर्जमाफी की फर्जी सूची के खिलाफ पंचायत दफ्तर के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। किसान रामकुमार सिंह लोधी ने कहा, 'यदि इस मामले को जल्द नहीं निपटाया जाता है तो हम बड़ी संख्या में आत्महत्या करेंगे।' लोधी का कहना है कि, 'कर्ज इस दुनिया का सबसे भयानक पाप है। जय किसान ऋण माफी योजना के तहत प्रदर्शित किसानों की सूची में मेरे पिता के नाम के आगे 9,547 रुपये का उल्लेख किया गया है। जबकि मेरे नाम के आगे 70,481 रुपये लिखे हुए हैं।' हालांकि लोधी ने यह स्वीकार किया कि उन्होंने चने की फसल के लिए कर्ज लिया था, लेकिन उसकी राशि केवल 17,000 थी। उन्होंने कहा, 'मेरे पिता ने कभी कोई कर्ज नहीं लिया था फिर भी उनका नाम शामिल किया गया है।' वहीं इस मौके पर किसान ब्रजेंद्र सिंह ने बताया कि, 'गांव के करीब 100 किसान प्रभावित हुए हैं। जिन लोगों ने कर्ज लिया ही नहीं उन्हें डिफॉल्टर दिखा दिया गया है।'
हालांकि राज्य के सहकारिता मंत्री गोविंद सिंह का कहना है कि, 'हम पहले ही मामले की जांच शुरू कर चुके हैं और यह सुनिश्चित करेंगे कि जिन किसानों ने कर्ज नहीं लिया है उन्हें कोई परेशानी न हो।' जबकि कर्जमाफी घोटाले के मामले में पहली गिरफ्तारी शुक्रवार को सुसनेर के आगर-मालवा से हुई है।
कानपुर (उत्तर प्रदेश)। प्रदेश का शिक्षा विभाग किस तरह भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हुआ है, इसका जीता जागता नमूना पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के गृह जिले इटावा में देखने को मिला है, जहां स्कूलों में छात्रवृत्ति के नाम पर 14.61 करोड़ के घोटाले को अंजाम दिया गया है। इस मामले में आर्थिक अपराध शाखा कानपुर यूनिट ने इटावा के 65 स्कूलों के प्रधानाचार्य व प्रबंधक समेत शिक्षा विभाग के 154 अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है।
आपको बता दें कि इटावा में शैक्षिक सत्र 2008-09 के दौरान कक्षा 1 से 10 तक के अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ावर्ग, अल्पसंख्यक वर्ग, सामान्य वर्ग के छात्र-छात्राओं की अलग-अलग स्कूलों में फर्जी संख्या दिखाकर छात्रवृत्ति घोटाला किए जाने की बात सामने आई थी। 6 मई 2010 को शासन ने इस मामले की जांच ईओडब्ल्यू को सौंपी थी। जांच के दौरान बड़े पैमाने पर इसमें घोटाले की पुष्टि हुई। जिसके बाद कल आर्थिक अपराध शाखा ने कानपुर सेक्टर थाने में दो एफआईआर दर्ज की गई। पहली एफआईआर में 14,03,28,474 रुपये के घोटाले का जिक्र है और इसमें 102 लोगों को आरोपी बनाया गया है जबकि दूसरी एफआईआर में 57,76,400 रुपये के घोटाले का जिक्र है और इसमें 52 लोगों को भ्रष्टाचार का आरोपी बनाया गया है। इसमें पहली एफआईआर में इटावा में तैनात रहे तत्कालीन 20 अधिकारियों को नामजद किया गया है। इसमें 14 सहायक बेसिक शिक्षा अधिकारी शामिल हैं। जिन अधिकारियों को भ्रष्टाचार के आरोप में नामजद किया गया है उसमें जिला समाज कल्याण अधिकारी इंद्रा सिंह, पिछड़ा वर्ग कल्याण अधिकारी अजीत सिंह, बेसिक शिक्षा अधिकारी जेपी राजपूत, सहायक बेसिक शिक्षा अधिकारी सियाराम दोहरे, मोहम्मद अल्ताफ, रेखा श्रीवास्तव, नाथू राम दोहरे, बीएन सिंह, ब्रहमपाल सिंह वर्मा, बीएल गोस्वामी, साधव सिंह, ओपी सिंह, राम अवतार शुक्ला, राम मूर्ति सिंह चौहान, नरेश कुमार वर्मा, कैलाश नाथ कन्नौजिया, ओपी त्रिपाठी, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के पटल सहायक मोहम्मद उबैदुर्रहमान, नगर शिक्षा अधिकारी सरला वर्मा, जिला अल्प संख्यक कल्याण अधिकारी शामिल हैं। इसके अलावा 37 स्कूलों के प्रबंधक और प्रधानाचार्यों व अन्य लोगों को नामजद किया गया है। दूसरी एफआईआर में उक्त में से कई अधिकारियों व 27 स्कूलों के प्रबंधकों और प्रधानाचार्यों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। ईओडब्ल्यू ने अपनी जांच में पाया कि स्कूल प्रबंधकों, प्रधानाचार्यों और अधिकारियों की मिली भगत से सरकारी धन को आपस में बांट लिया गया। हालांकि इस जांच के दौरान सभी स्कूल संचालित पाए गए। लेकिन अब देखना यह होगा कि इन आरोपियों के खिलाफ कितनी सख्त कार्रवाई होती है।
कासगंज (उत्तर प्रदेश) । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश को खुली जगह में शौच से मुक्ति दिलाने के लिए लगातार प्रयासरत हैं, वहीं ग्रामीण इलाकों में ग्राम प्रधान प्रधानमंत्री की इस पहल को पलीता लगाने में लगे हुए हैं। कासगंज में एक ऐसे ही मामले में मुख्य विकास अधिकारी ने शौचालय की लाखों की राशि का गबन करने के आरोप में दो प्रधानों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और गबन की गयी राशि की वसूली के आदेश दिए हैं। लेकिन अभी तक खण्ड विकास अधिकारी व सहायक विकास अधिकारी पंचायत गंजडुण्डवारा ने न तो दोनों प्रधानों से गबन की धनराशि की वसूली की है और न ही उनके खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज (एफआईआर) दर्ज कराई है।
कासगंज जिले की पटियाली तहसील के विकास खंड गंजडुण्डवारा की ग्राम पंचायत उलाई खेड़ा के ग्राम बमनपुरा निवासी अरविंद हरपाल ने ग्राम पंचायत उलाई खेडा में प्रधान द्वारा मानक तथा गुणवत्ता विहीन बनवाये गये शौचलयों की 8 माह पहले जांच करायी थी। यह जांच सहायक विकास अधिकारी पंचायत गंजडुण्डवारा के निर्देशन में खण्ड प्रेरकों के द्वारा की गई थी। इस जांच में यह खुलासा हुआ था कि पूर्व प्रधान राजकुमार ने 259 शौचालयों का निर्माण न करके 531150 रुपए का गबन किया है। जबकि वर्तमान प्रधान सत्यप्रकाश के द्वारा 259 शौचालयों का निर्माण न करके 336200 रुपए का गबन किया गया है ।
जांच रिपोर्ट आने के बाद जिला पंचायत राज अधिकारी कासगंज ने 15-12-2018 को खण्ड विकास अधिकारी व सहायक विकास अधिकारी पंचायत गंजडुण्डवारा को निर्देश दिया कि वह गबन की गयी राशि से मानक के अनुसार सभी शौचालयों का निर्माण कराएं। लेकिन इस निर्देश के बावजूद दोनों प्रधानों ने न तो अभी तक शौचालय का निर्माण करवाया और न ही उन्होंने अभी तक अपने पक्ष में कोई साक्ष्य प्रस्तुत किया है।
ऐसी दशा में मुख्य विकास अधिकारी कासगंज ने 03-01-2019 को खण्ड विकास अधिकारी व सहायक विकास अधिकारी पंचायत गंजडुण्डवारा को निर्देश दिया कि वो पत्र प्राप्ति के तीन दिवस के अन्दर शौचालय निर्माण न कराये जाने के सम्बंध में वसूली धनराशि जिला स्वच्छता समिति कासगंज के खाते में तत्काल जमा कराएं तथा उपरोक्त समय में वसूली धनराशि न जमा करने पर संबंधित प्रधानों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराने की कार्यवाही सुनिश्चित करें। लेकिन हैरानी की बात यह है कि मुख्य विकास विकास अधिकारी के आदेश के बावजूद खण्ड विकास अधिकारी व सहायक विकास अधिकारी पंचायत गंजडुण्डवारा ने न तो अभी तक संबंधित से वसूली धनराशि जमा कराई है और न ही दोनों प्रधानों के खिलाफ एफआईआर ही दर्ज करायी है। वहीं अधिकारियों और प्रधानों की इस मनमानी से परेशान होकर अरविंद हरपाल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को इस गबन के खिलाफ कार्रवाई के लिए लिखा है, लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं आया है।
लखीसराय (बिहार)। किसी के दबाव या लालच से धर्म परिवर्तन कर लेने के बारे में बहुत पढ़ा और सुना होगा। लेकिन लखीसराय में एक ऐसा अनोखा मामला सामने आया है जहां एक बीडीओ ने जिला प्रशासन को धमकी दी है कि अगर उनका निलंबन वापस नहीं लिया गया तो वह धर्म परिवर्तन कर लेंगे। नाराज अधिकारी ने इसके लिए विभाग को 7 फरवरी तक की चेतावनी दी है।
लखीसराय जिले के रामगढ़ चौक प्रखंड के प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) मनोज कुमार अग्रवाल ने निलंबन की कार्रवाई को एकतरफा एवं राजनीतिक साजिश बताया है। बीडीओ का कहना है कि जातिवाद दुर्भावना से ग्रसित होकर निलंबन की कार्रवाई की गई है। निलंबन से पहले मुझसे स्पष्टीकरण भी नहीं मांगा गया है। उनके अनुसार 4 माह पहले बिल्लो और ग्राम पंचायत के पंचायत सचिव का उन्होंने स्थानांतरण किया था। सत्तारूढ़ दल के कुछ नेताओं ने इस स्थानांतरण को न करने के लिए कहा था। लेकिन उन्होंने उस अनुरोध को ठुकरा दिया था। इसके बाद ही उन्हें बर्बाद कर देने की धमकी दी गई थी। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि 7 फरवरी तक निलंबन रद्द नहीं हुआ तो वह हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम धर्म कबूल कर लेंगे। उनका कहना है कि विभागीय कार्यवाही के दौरान यदि भ्रष्टाचार सिद्ध होता है तो मैं स्वयं त्यागपत्र दे दूंगा। बीडीओ का कहना है कि यह कहने में कोई हिचक नहीं कि मैं बिहार के लास्ट कारपोरेट, लास्ट इंसफिशिएंट, लास्ट इन एक्टिव पॉलिटेक्निक बेस्ड पदाधिकारियों में एक हूं। नियुक्ति से आज तक प्रखंड विकास पदाधिकारी के हर मापदंड पर मैंने अच्छा काम किया है।
आपको बता दें कि जिलाधिकारी शोभेन्द्र कुमार चौधरी ने बीडीओ के विरूद्ध अपने पद व अधिकार का दुरूपयोग करने, अपने दायित्वों को आधार बनाकर निजी लाभ के लिए राशि प्राप्त करने, जनप्रतिनिधियों के लिए बनाए गए नियम के प्रतिकूल आचरण करने, विभागीय आदेशों का उल्लंघन करने, विभागीय दायित्वों को मनमाने तरीके से करने, उच्च अधिकारियों को गलत सूचना देने आदि कई गंभीर आरोप लगाते हुए ग्रामीण विकास विभाग को निलंबन की कार्रवाई के लिए भेजा था। विभाग ने आरोपों की समीक्षा के बाद बीडीओ को निलंबित कर दिया।
राजनांदगांव (छत्तीसगढ़) । सरकार के तमाम दावों के बावजूद प्रदेश के अधिकारी और कर्मचारी मनरेगा के तहत जारी किए जाने वाले धन को लूटने से बाज नहीं आ रहे हैं। ताजा मामला मनरेगा में स्टापडेम व डब्ल्यूबीएम सड़क निर्माण समेत अन्य कार्यों में भ्रष्टाचार का है। जिसमें चालीस लाख रुपए की हेराफेरी का खुलासा होने पर डोंगरगढ़ उपसंभाग के एसडीओ, तीन एसई, संभागीय लेखाधिकारी, वरिष्ठ लेखा लिपिक और सहायक ग्रेड तीन के कर्मचारी समेत सात को निलंबित कर दिया गया है।
आपको बता दें कि वर्ष 2016-17 और 2017-18 में भू-जल संवर्धन के लिए जिला पंचायत राजनांदगांव ने मनरेगा के तहत 5.48 करोड़ की स्वीकृति दी थी। इसमें डोंगरगढ़ ब्लॉक के छह ग्राम पंचायतों छीपा, पलांदुर, डोड़की, सलटिकरी, ठाकुरटोला व कोलिहापुरी में 13 स्टापडेम निर्माण होना था। इस मामले का खुलासा हुआ तब पता चला कि निर्माण के लिए अफसरों और कर्मचारियों ने निविदा में तय रेट को बढ़ाकर बारह निजी सप्लायरों को फायदा पहुंचाकर चालीस लाख की हेराफेरी की । इन हेराफेरी करने वालों में डोंगरगढ़ उपसंभाग के एसडीओ एम. घोरमारे, एसई निखिलेश गैरारे, गरिमा चौहान, अनुपम चंद्राकर, संभागीय लेखाधिकारी विजय कुमार कौशल, वरिष्ठ लेखा लिपिक राजेंद्र प्रसाद श्रीवास्तव व सहायक ग्रेड तीन दीपक लाल हरिहारणो शामिल हैं, जिन्हें निलंबित कर दिया गया है।
जयपुर (राजस्थान) । कोटा में अफीम का पट्टा जारी करने के बदले एक लाख रूपए की रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार नारकोटिक्स विभाग का उप आयुक्त सहीराम मीणा अरबों की सम्पति का मालिक निकला है । राज्य भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) की अब तक की जांच में उसके एवं परिजनों के नाम से करीब 400 करोड़ रूपए की सम्पति और नकदी होने की बात सामने आई है । अकूत काली कमाई सामने आने के बाद अब आयकर विभाग ने भी इसकी जांच शुरू कर दी है। राज्य के इतिहास में यह सबसे बड़ी एसीबी की कार्रवाई मानी जा रही है ।
आपको बता दें कि सहीराम मीणा 1989 बैच का आईआरएस अधिकारी है। जो सवाई माधोपुर जिले के जीबली गांव निवासी है। एसीबी की पूछताछ में सहीराम मीणा के पास 400 करोड़ रूपए की सम्पति होने का खुलासा हुआ है। एसीबी ने सोमवार को जब सहीराम मीणा के 15 बैंक खातों और लॉकरों को खोला तो अधिकारी चकित रह गए । इन लॉकरों में नकदी और ज्वलैरी के साथ ही हीरे भी मिले हैं । जबकि मीणा के कोटा और जयपुर स्थित आवास से करीब 7 करोड़ रूपए नकद रुपए बरामद किए गए हैं। एसीबी की अब तक की जांच में सहीराम मीणा, उसकी पत्नी और बेटा 106 आवासीय प्लॉट, एक मैरिज गार्डन, 25 दुकानें, दो इंडस्ट्रीयल प्लॉट, एक पेट्रोल पंप, मुम्बई और दिल्ली में एक-एक फ्लैट, सात बीघा कृषि भूमि, एक फार्म हाउस, चार ट्रक, एक टायर फर्म और एक एजुकेशन संस्थान के मालिक हैं । इतना ही नहीं एसीबी अधिकारियों का कहना है कि मीणा ने गांव के कुछ गरीब लोगों के नाम से भी रणथम्भौर सेंचूरी के आसपास जमीनें खरीद रखी हैं ।
एसीबी की पूछताछ में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि सहीराम मीणा दौसा संसदीय सीट से चुनाव लड़ना चाहता था, उसने विधानसभा चुनाव 2018 में गंगापुरसिटी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की पूरी तैयारी कर ली थी, लेकिन वीआरएस का आवेदन मंजूर नहीं होने के कारण वह चुनाव नहीं लड़ सका। सहीराम मीणा के दो रिश्तेदार भाजपा के बड़े नेता हैं और एक रिश्तेदार कांग्रेस में है । जबकि सहीराम मीणा की बेटी सोनिका आईएएस अधिकारी है, जो उत्तराखंड के टिहरी जिले में कलेक्टर के पद पर तैनात है । सहीराम मीणा ने विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के कई प्रत्याशियों को फंड भी दिया था । वहीं पूछताछ के दौरान सीने में दर्द और बेचैनी की शिकायत के बाद मीणा को कोटा के जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया । जहां से जांच के बाद सहीराम मीणा और उसके दलाल कमलेश को एसीबी की विशेष कोर्ट के मजिस्ट्रेट के घर में पेश किया गया। मजिस्ट्रेट ने मामले की सुनवाई के बाद सहीराम मीणा और दलाल कमलेश को रिमांड पर भेज दिया गया ।
रायपुर। पुलिस सुधार की मुहिम के तहत छत्तीसगढ़ सरकार आजादी के बाद सबसे बड़ा कदम उठाने जा रही है। सरकार पुलिस में क्राइम इनवेस्टिगेशन (अपराधों की जांच) और लॉ एंड आर्डर (कानून व्यवस्था) बनाए रखने के लिए अलग-अलग टीमों का गठन करने जा रही है। फरवरी में पेश होने जा रहे बजट में वित्त विभाग इससे संबंधित प्रस्ताव लाने वाला है। सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के एक फैसले में जांच और कानून व्यवस्था का काम अलग-अलग टीमों को देने की बात कही थी। लेकिन किसी भी राज्य ने इस संबंध में कोई कदम नहीं उठाया। छत्तीसगढ़ वह पहला राज्य होगा जो इस दिशा में काम करने जा रहा है।
आपको बता दें कि राज्य में कांग्रेस की नई सरकार के आने के बाद से पुलिस सुधार की मुहिम चल रही है। नए डीजीपी डीएम अवस्थी ने पदभार ग्रहण करते ही जिलों में पदस्थ क्राइम ब्रांचों को भंग कर दिया है। अब नई व्यवस्था बनाने की कवायद चल रही है। गृह विभाग ने वित्त विभाग को प्रस्ताव बनाकर दिया है, जिसे आगामी बजट में शामिल किया जाना है। इस प्रस्ताव के मुताबिक थानों में दो क्राइम इनवेस्टिगेशन की टीम एक इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी के नेतृत्व में गठित की जाएगी। इसी तरह एक अलग टीम लॉ एंड आर्डर के लिए होगी जिसका इंचार्ज इंस्पेक्टर होगा। इन दोनों इंस्पेक्टर के ऊपर एक सीनियर इंस्पेक्टर की नियुक्ति की जाएगी जिसे राजपत्रित अधिकारी का दर्जा दिया जाएगा। दोनों टीमें अपने थाने के सीनियर इंस्पेक्टर को रिपोर्ट करेंगी। सीनियर इंस्पेक्टर जिले के एसपी, डीएसपी या अन्य अधिकारी को रिपोर्ट करेगा। बजट में शामिल होने के बाद थानों में नई टीमों का गठन किया जाएगा। क्राइम इनवेस्टिगेशन के लिए पुलिस टीमों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन्हें कानून के ज्ञान के साथ ही फारेंसिक और साइबर तकनीक का भी प्रशिक्षण दिया जाएगा।
गौरतलब है कि भारत में पुलिस व्यवस्था पुलिस एक्ट 1861 के मुताबिक चल रही है। यह कानून अंग्रजों ने बनाया था। इसी वजह से आज भी पुलिस व्यवस्था को औपनिवेशिक कहा जाता है। स्वतंत्र भारत में पुलिस सुधारों के लिए 1977 में पहली बार धर्मवीर की अध्यक्षता में राष्ट्रीय पुलिस आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने भी जांच और कानून व्यवस्था के लिए अलग टीमों की सिफारिश की थी। 1998 में जेएफ रिबरो समिति, 2000 में पद्मनाभैया समिति, आपात काल के दौरान गठित शाह आयोग सभी ने पुलिस सुधारों की वकालत की लेकिन कुछ नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद भी कोई काम नहीं हो पाया।
रायपुर। पुलिस सुधार की मुहिम के तहत छत्तीसगढ़ सरकार आजादी के बाद सबसे बड़ा कदम उठाने जा रही है। सरकार पुलिस में क्राइम इनवेस्टिगेशन (अपराधों की जांच) और लॉ एंड आर्डर (कानून व्यवस्था) बनाए रखने के लिए अलग-अलग टीमों का गठन करने जा रही है। फरवरी में पेश होने जा रहे बजट में वित्त विभाग इससे संबंधित प्रस्ताव लाने वाला है। सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के एक फैसले में जांच और कानून व्यवस्था का काम अलग-अलग टीमों को देने की बात कही थी। लेकिन किसी भी राज्य ने इस संबंध में कोई कदम नहीं उठाया। छत्तीसगढ़ वह पहला राज्य होगा जो इस दिशा में काम करने जा रहा है।
आपको बता दें कि राज्य में कांग्रेस की नई सरकार के आने के बाद से पुलिस सुधार की मुहिम चल रही है। नए डीजीपी डीएम अवस्थी ने पदभार ग्रहण करते ही जिलों में पदस्थ क्राइम ब्रांचों को भंग कर दिया है। अब नई व्यवस्था बनाने की कवायद चल रही है। गृह विभाग ने वित्त विभाग को प्रस्ताव बनाकर दिया है, जिसे आगामी बजट में शामिल किया जाना है। इस प्रस्ताव के मुताबिक थानों में दो क्राइम इनवेस्टिगेशन की टीम एक इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी के नेतृत्व में गठित की जाएगी। इसी तरह एक अलग टीम लॉ एंड आर्डर के लिए होगी जिसका इंचार्ज इंस्पेक्टर होगा। इन दोनों इंस्पेक्टर के ऊपर एक सीनियर इंस्पेक्टर की नियुक्ति की जाएगी जिसे राजपत्रित अधिकारी का दर्जा दिया जाएगा। दोनों टीमें अपने थाने के सीनियर इंस्पेक्टर को रिपोर्ट करेंगी। सीनियर इंस्पेक्टर जिले के एसपी, डीएसपी या अन्य अधिकारी को रिपोर्ट करेगा। बजट में शामिल होने के बाद थानों में नई टीमों का गठन किया जाएगा। क्राइम इनवेस्टिगेशन के लिए पुलिस टीमों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन्हें कानून के ज्ञान के साथ ही फारेंसिक और साइबर तकनीक का भी प्रशिक्षण दिया जाएगा।
गौरतलब है कि भारत में पुलिस व्यवस्था पुलिस एक्ट 1861 के मुताबिक चल रही है। यह कानून अंग्रजों ने बनाया था। इसी वजह से आज भी पुलिस व्यवस्था को औपनिवेशिक कहा जाता है। स्वतंत्र भारत में पुलिस सुधारों के लिए 1977 में पहली बार धर्मवीर की अध्यक्षता में राष्ट्रीय पुलिस आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने भी जांच और कानून व्यवस्था के लिए अलग टीमों की सिफारिश की थी। 1998 में जेएफ रिबरो समिति, 2000 में पद्मनाभैया समिति, आपात काल के दौरान गठित शाह आयोग सभी ने पुलिस सुधारों की वकालत की लेकिन कुछ नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद भी कोई काम नहीं हो पाया।