जीरो एफआईआर क्या होती है
हर पुलिस स्टेशन की एक क्षेत्रीय सीमा होती है। यदि किसी कारण से आप अपने क्षेत्र के थाने में नहीं पहुंच पा रहे हैं या फिर आपको इसकी जानकारी नहीं है तो जीरो एफआईआर के तहत आप सबसे नजदीकी पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करवा सकते हैं।
- जीरो एफआईआर में क्षेत्रीय सीमा नहीं देखी जाती है। इसमें अपराध के स्थान से कोई मतलब नहीं होता है।
- इसमें सबसे पहले रिपोर्ट दर्ज की जाती है।
- इसके बाद जिस थाना क्षेत्र में घटना हुई है, वहां के क्षेत्र वाले पुलिस स्टेशन में एफआईआर को फॉरवर्ड कर दी जाती है।
- यह प्रावधान सभी व्यक्तियों के लिए किया गया है।
- इसका उद्देश्य है कि क्षेत्रीय सीमा की वजह से किसी को न्याय मिलने में देर न हो और जल्द से जल्द शिकायत पुलिस तक पहुंच जाए।
जीरो एफआईआर के फायदे
- इस प्रावधान के तहत जांच की प्रक्रिया तुरंत शुरू हो जाती है और समय बर्बाद नहीं होता है।
- इसमें पुलिस 00 सीरियल नंबर से एफआईआर लिखती है। इसके बाद केस को संबंधित थाने में ट्रांसफर कर दिया जाता है।
- जीरो एफआईआर से अथॉरिटी को शुरुआती स्तर पर ही कार्रवाई करने का समय मिल जाता है।
जीरो एफआईआर न लिखें तो क्या करें
- यदि कोई भी पुलिस स्टेशन जीरो एफआईआर लिखने से मना करे तो पीड़ित सीधे पुलिस अधिक्षक को इसकी शिकायत कर सकता है और अपनी कम्प्लेंड रिकॉर्ड करवा सकता है।
- एसपी खुद इस मामले की जांच कर सकते हैं या फिर किसी दूसरी अधिकारी को निर्देशित कर सकते हैं।
- सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट कर चुका है कि कोई भी पुलिस ऑफिसर एफआईआर लिखने से इंकार करे तो उस पर डिसिप्लिनरी एक्शन लिया जाए।
- कोई व्यक्ति चाहे तो वह ह्युमन राइट्स कमीशन में भी जा सकता है।
लापता व्यक्ति कौन है
किसी भी व्यक्ति के लापता होने की तिथि से अर्थात जिस दिन प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई गयी है, उस दिन से 7 वर्ष पूरा होने पर माना जायेगा कि उस व्यक्ति का देहान्त हो चुका है। हालांकि केवल कोई न्यायालय ही किसी लापता व्यक्ति को मृत घोषित कर सकता है।
लापता व्यक्ति की रिपोर्ट करें
आपको बहरे या सुनने में असमर्थ या बोलने की क्षमता में असक्षम, लापता व्यक्ति की रिपोर्ट करने के लिए आपको पुलिस स्टेशन जाना चाहिए।
एक लापता व्यक्ति की रिपोर्ट करने के लिए 24 घण्टे तक प्रतीक्षा नहीं करनी होती है यदि आपको किसी भी व्यक्ति की सुरक्षा और कल्याण के बारे में चिंता है, तो आप इसकी तुरंत रिपोर्ट कर सकते हैं। किसी व्यक्ति का लापता हो जाना अपराध नहीं है।
जब आप एक लापता व्यक्ति की रिपोर्ट फाइल करते हैं, तो पुलिस की मदद करने के लिए आप निम्नलिखित जानकारी भी साथ में ला सकते हैं:
- लापता हुए व्यक्ति की हाल की एक तस्वीर
- लापता हुए व्यक्ति के टेलीफोन नंबर
- मित्रों और सहयोगियों के नाम, पते और फोन नंबरों की एक सूची
- संभावित गन्तव्य स्थान जैसे कि पसंदीदा स्थल, काम के स्थल या पिछले किसी जुड़ाव के साथ वाली जगह
- कोई ज्ञात चिकित्सीय जानकारी, जिसमें डॉक्टरों या आवश्यक दवाइयों के नाम शामिल हैं
- लापता व्यक्ति का पूरा विवरण जिसमें आयु, ऊंचाई, वजन, आंखों और बालों के रंग और कोई भी अन्य विशिष्ट विशेषताएं
- गायब होने की तारीख, नाम, पिता का नाम, धर्म, प्रदेश की जानकारी
यह सुविधा दिल्ली पुलिस, गुड़गांव पुलिस, राजस्थान पुलिस, उत्तर प्रदेश की नोएडा पुलिस, उत्तराखंड पुलिस, पंजाब पुलिस, हरियाणा पुलिस, हिमाचल प्रदेश पुलिस और चंडीगढ़ पुलिस द्वारा समन्वित रूप से उपलब्ध कराई गई है।
कर्फ्यू (धारा 144)-
किसी भी इलाके में सीआरपीसी की धारा-144 के तहत शांति व्यवस्था कायम करने के लिए कर्फ्यू लगाया जाता है। इस धारा को लागू करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट यानी जिलाधिकारी एक नोटिफिकेशन जारी करता है। और जिस जगह भी यह धारा लगाई जाती है, वहां चार या उससे ज्यादा लोग इकट्ठे नहीं हो सकते हैं।
इस दौरान सारे कानूनी अधिकार इलाके के मजिस्ट्रेट को दे दिये जाते हैं, जिस पर शांति व्यवस्था को फिर से स्थापित करने की जिम्मेदारी होती है।
कर्फ्यू के दौरान सजा का प्रावधान-
धारा-144 का उल्लंघन करने वाले या इस धारा का पालन नहीं करने वाले व्यक्ति की गिरफ्तारी धारा-107 या फिर धारा-151 के तहत की जा सकती है। इसके आरोपी को एक साल कैद की सजा भी हो सकती है। वैसे यह एक जमानती अपराध है, इसमें जमानत हो जाती है।
यदि भीड़ अधिकारी का आदेश नहीं मानती है, तो उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 145 के अनुसार मुकदमा चलाकर 2 वर्ष का कारावास या जुर्माना अथवा दोनों की सजा दी जा सकती है। यदि भीड़ गैर-कानूनी है तो आईपीसी की धारा 149 के अनुसार भीड़ को सजा दी जायेगी। भीड़ को आदेश देने वाले अधिकारी को अपराधी नहीं माना जायेगा । उस पर मुकदमा चलाने के लिए राज्य या केंद्र सरकार की मंजूरी प्राप्त करनी पड़ेगी।
कर्फ्यू के दौरान प्रतिबंध-
(1) सिर्फ परीक्षार्थियों, विवाह समारोह, शव यात्रा व धार्मिक उत्सव पर निषेधाज्ञा लागू नहीं, (2) कोई भी व्यक्ति बिना किसी सक्षम अधिकारी की अनुमति के अनशन, धरना या प्रदर्शन नहीं करेगा, (3) कोई भी व्यक्ति लाठी, डंडा, बल्लम, स्टिक या किसी प्रकार का घातक अस्त्र, आग्नेयास्त्र लेकर नहीं चलेगा, (4) लाइसेंसी शस्त्र लेकर कार्यालय प्रवेश पर भी मनाही, (5) बिना अनुमति जुलूस निकालने या चक्काजाम करने पर रोक, (6) बिना अनुमति तेज आवाज के पटाखे बजाने, बेचने पर प्रतिबंध, (7) किसी समुदाय-सम्प्रदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले उत्तेजनात्मक भाषण या विज्ञापन पर भी रोक, (8) बिना अनुमति लाउडस्पीकर, डीजे आदि का प्रयोग वर्जित, (9) परीक्षा के दौरान अनुचित साधनों के उपयोग व इसकी सहायता करने पर रोक, (10) परीक्षा केंद्र से दो सौ गज की दूरी पर पांच या इससे अधिक लोग इकट्ठे नहीं होंगे (11) शादी- बारातों में शौकिया शस्त्र प्रदर्शन पर रोक ।
कैदियों को सेक्स सबंध बनाने का अधिकार-
- पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट मुताबिक जेल में बंद कैदियों को भी अब अपने पति या पत्नी से यौन संबंध बनाने का अधिकार मिलेगा।
- संविधान के मुताबिक ये एक मौलिक अधिकार है और कैदियों को इससे वंचित नहीं रखा जा सकता है।
- हाईकोर्ट का कहना है कि एक रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में कमेटी का गठन किया जाए। जो जेलों की हालत को समझकर एक दिशा-निर्देश बनाए।
- कमेटी ये तय करेगी कि किस तरह के कैदियों को और किस परिस्थिति में ये अधिकार दिया जाएगा।
- जेल के अंदर सुविधा बनाई जाएगी, जहां कैदी की पत्नी या उसका पति उससे मिल सके।
- कोर्ट के मुताबिक किस कैदी को यह अधिकार दिया जाएगा, ये सरकार तय करेगी। इसमें सामाजिक सरोकार और कानून व्यवस्था का ख्याल रखा जाएगा।
- कोर्ट के मुताबिक हर व्यक्ति को अपने खानदान को बढ़ाने का आधिकार है
किसी भी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर किया गया दण्डनीय कार्य-
- किसी अभियुक्त को शरण देना।
- किसी पर गलत आरोप लगाना या झूठी गवाही देना।
- किसी अभियुक्त को छिपाना या साक्ष्य को खत्म करना।
- जाली सिक्का नोट अपने पास रखना।
- लोकसेवक के कार्य में बाधा डालना।
- सार्वजनिक स्थान पर जुआ खेलना।
- किसी भी धर्मस्थान को उसकी अवमानना हेतु अपवित्र करना।
- दूसरों की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने वाले शब्दों का इस्तेमाल करना।
- बिना लाइसेंस के आग्नेय अस्त्र या विस्फोटक पदार्थ रखना।
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 39 के अनुसार-
- यह देश के सभी नागरिकों और निवासियों को यह दायित्व सौंपती है कि कुछ खास तरह के गंभीर अपराधों के घटित होने अथवा ऐसे गंभीर अपराध किए जाने की तैयारी की उन्हें जानकारी हो तो उन्हें इस की सूचना तुरन्त निकटतम पुलिस स्टेशन अधिकारी अथवा मजिस्ट्रेट को देनी चाहिए।
- यदि किसी व्यक्ति को ऐसी जानकारी होते हुए भी वह ऐसी जानकारी पुलिस स्टेशन के भारसाधक अधिकारी अथवा मजिस्ट्रेट को नहीं देता है तो पता लगने पर कि उसे ऐसी जानकारी थी उसे यह साबित करना होगा कि ऐसी सूचना नहीं देने का उस के उचित कारण था।
- इस धारा में उन अपराधों की सूची दी हुई है जिन की सूचना देने का दायित्व प्रत्येक व्यक्ति को दिया गया है। इस सूची में भारतीय दंड संहिता की धारा 121 से 126,130,143 से 145, 147, 161 से 165-ए, 272 से278, 302, 303, 304, 382, 392 से 399, 409, 431 से 439 449, 450, 456 से 460 और धारा 489ए से489ई सम्मिलित हैं।
इनमें मुख्य रुप से शामिल हैं-
- राज्य के विरुद्ध अपराध, लोक प्रशान्ति के विरुद्ध अपराध, अवैध परितोषण से संबंधित अपराध, खाद्य और औषधियों के अपमिश्रण से संबंधित अपराध, जीवन को संकट में डालने वाले अपराध, फिरौती आदि के लिए अपहरण करने के अपराध, चोरी करने के लिए मृत्यु या अवरोध पैदा करने के पश्चात चोरी का अपराध, लूट और डकैती, ग़बन, संपत्ति की ठगी का अपराध, गृह भेदन और करेंसी नोटों और बैंक नोटों से संबंधी अपराध सम्मिलित हैं।
पैरोल क्या है
पैरोल का अर्थ है किसी अपराधी द्वारा अपनी सजा का एक बड़ा भाग काटने के बाद, अच्छे आचरण की वजह उसे जेेल से मुक्त किया जाना। हीरालाल बनाम बिहार राज्य(1977) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लंबी अवधि के कैदियों को अस्थायी पैरोल पर छोड़ा जाना चाहिए। अस्थायी पैरोल का अर्थ है कुछ समय के लिए व्यक्ति को जेल से छोड़ देना और पैरोल का समय समाप्त होते ही वापस जेल भेज देना।
पैरोल के नियम क्या हैं
- जेल में बंद सजायाफ्ता कैदी को साल में दो बार पैरोल मिलती है। ताकि वह अपने परिवार में किसी समारोह, दुख या खुशी में शरीक हो सके।
- जबकि कृषि से संबंधित कैदी के लिए यह समय 6 सप्ताह व सामान्य कैदी के लिए 4 माह का होता है।
- ऐसे में जो कैदी पैरोल पर जाकर वापस आने की बजाए भगौड़े हो जाते हैं। ऐसे कैदियों पर पंजाब गुड कंडक्ट प्रिजनर एक्ट 1962 के सेक्शन 8 की धारा ((2)) के तहत कार्रवाई होती है। इसमें दो साल की कैद व जुर्माने का भी प्रावधान है।
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि कैदी का आचरण जेल में अच्छा रहता है तो उसे वर्ष में दो सप्ताह पैरोल पर छोड़ देना चाहिए।
पैरोल पर छूटे व्यक्ति पर शर्तें -
- व्यक्ति नशा नहीं करेगा,
- शराब के अड्डों पर नहीं जायेगा,
- जुआ नहीं खेलेगा,
- हथियार नहीं रखेगा,
- शिकार नहीं करेगा,
- अच्छे नागरिक की तरह जीवन बिताएगा,
- कानून का पालन करेगा,
- अपराधियों को पत्र नहीं लिखेगा,
- देर रात तक बाहर नहीं घूमेगा,
- वेश्याओं के पास नहीं जायेगा,
- किसी निश्चित क्षेत्र में रहेगा,
- नाच-गाना नहीं करेगा,
- बिना इजाजत शादी नहीं करेगा,
- नौकरी नहीं बदलेगा,
- पशुओं को जान से नहीं मारेगा।
पैरोल की शर्तें तोड़ने पर सजा-
पैरोल की शर्तें तोड़ने पर व्यक्ति को वापस जेल भेजा जा सकता है। और सजा के शेष भाग को भुगतना पड़ सकता है। अगर व्यक्ति पैरोल पर छोड़े जाने के बाद दोबारा जुर्म करता है तो उसे पैरोल दोबारा नहीं मिलेगा।
प्रोबेशन (अपराधी परिवीक्षा अधिनियम 1958) और पैरोल में अंतर
प्रोबेशन और पैरोल में अंतर यह है कि पैरोल में सजा का कुछ भाग माफ होता है, जबकि प्रोबेशन में पूरी सजा ही माफ कर दी जाती है। यदि किसी व्यक्ति को प्रोबेशन पर छोड़ा जाता है तो प्रोबेशन को सजा नहीं माना जाता है।
प्रोबेशन पर छोड़ना-
(1) अपराधी को चेतावनी देकर छोड़ देना। (2) अच्छे आचरण की शर्त पर छोड़ देना।
प्रोबेशन का लाभ 21 वर्ष से कम आयु के अपराधी को दिया जाता है। यदि 21 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति आईपीसी की धारा 379, 380, 391, 404, 420 का अपराध करता है तो चेतावनी या भर्त्सना करके छोड़ा जा सकता है, लेकिन आदतन अपराधी को या उम्र कैद वाले अपराधी को या देश छोड़ने की सजा मिलने वाले व्यक्ति को प्रोबेशन पर नहीं छोड़ा जा सकता है । पहली बार जुर्म करने वाले किसी भी उम्र के अपराधी को केवल तभी छोड़ा जा सकता है, जब उसने 2 वर्ष से कम की सजा वाला अपराध किया हो।
प्रोबेशन पर शर्तों का पालन-
- प्रोबेशन का लाभ लेने वाले को कोर्ट की शर्तों को मानना होगा,
- कुछ सुरक्षा धन जमा करना होगा,
- कोर्ट की आज्ञा के बिना अपना निवास स्थान नहीं बदल सकता,
- किसी दूसरे शहर या राज्य का निवासी नहीं बन सकता,
- बिना कोर्ट की आज्ञा शादी नहीं कर सकता,
- कोर्ट की आज्ञा के बिना यात्रा नहीं कर सकता,
- प्रोबेशनर जमानत पत्र भरना होगा,
- यदि शर्तों का पालन नहीं करेगा तो दोगुना दंड मिलेगा,
- प्रोबेशन अधिकारी की आज्ञा के बिना कोई कार्य नहीं करेगा,
यदि कोई अपराधी प्रोबेशन की शर्तों को तोड़ता तो कोर्ट धारा 9 के अनुसार गिरफ्तारी वारंट जारी करता है, यदि कोर्ट ठीक समझता है तो जमानत लेने वालों को भी समन जारी करता है, प्रोबेशनर के कोर्ट में पेशी के बाद उसे मूल अपराध की सजा भुगतने के लिए जेल में भेज दिया जाता है या 50 रुपए का जुर्माना लगाया जाता है।
कार्य विशेष परिस्थिति में किए गए कार्य दण्डनीय नहीं-
- सात वर्ष से कम उम्र के बालक द्वारा किया गया कोई कार्य।
- सात वर्ष से बारह वर्ष के बीच की उम्र के बालक द्वारा किया गया कोई कार्य, यदि उसने वह विशेष परिस्थिति में या नासमझी, अज्ञानता में किया है।
- विकृत चित्त वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य।
- नशे में रहने वाला व्यक्ति, जिसने अपनी इच्छा के विरुद्ध कोई कार्य किया हो।
- किसी व्यक्ति द्वारा धमकी के अंतर्गत किया गया कार्य ।
- सहमति तथा सक्षमता से किया गया कार्य ।
- किसी न्यायिक पदाधिकारी द्वारा उक्त पद पर किया गया कार्य।
- अपनी रक्षा के लिए कुछ अपवादों के साथ किया गया कार्य।
पुलिस की पूछताछ
- अभियुक्त को पूछताछ के दौरान पुलिस से सहयोग करना चाहिए।
- अभियुक्त को सावधान भी रहना चाहिए कि पुलिस उसे झूठे मामले में न फंसाए।
- अभियुक्त को किसी कागज पर बिना पढ़े अथवा उसमें लिखी बातों से सहमत हुए बिना हस्ताक्षर नहीं करने चाहिए।
- किसी महिला और 15 साल से छोटे पुरुष को पूछताछ के लिए घर से बाहर नहीं ले जाया जा सकता है । उनसे घर पर ही पूछताछ की जा सकती है ।
- व्यक्ति मजिस्ट्रेट से अनुरोध कर सकता है कि उससे पूछताछ का उचित वक्त दिया जाए।
- पूछताछ के दौरान व्यक्ति ऐसे किसी सवाल का जवाब देने से मना कर सकता है , जिससे उसे लगे कि उसके खिलाफ आपराधिक मामला बनाया जा सकता है ।
- व्यक्ति पूछताछ के दौरान कानूनी या अपने किसी मित्र की सहायता की मांग कर सकता है और आम तौर पर ऐसी सहायता की मांग पुलिस मान लेती है।
तलाशी के लिए वारंट
- अदालत या मजिस्ट्रेट के तलाशी वारंट के बिना पुलिस किसी के घर की तलाशी नहीं ले सकती है ।
- आमतौर पर चोरी के सामान, फर्जी दस्तावेज, जाली मुहर, जाली करेंसी नोट, अश्लील सामग्री तथा जब्तशुदा साहित्य की बरामदगी के लिए तलाशी ली जाती है ।
- पुलिस अधिकारी को तलाशी के स्थान पर मौजूद संदिग्ध व्यक्तियों और वस्तुओं की तलाशी लेने देनी चाहिए।
- तलाशी और माल की बरामदगी इलाके के दो निष्पक्ष तथा प्रतिष्ठित व्यक्तियों की उपस्थिति में की जानी चाहिए।
- पुलिस को जब्त सामान की ब्योरा देते हुए पंचनामा तैयार करना चाहिए। इस पर दो स्वतंत्र गवाहों के भी हस्ताक्षर होने चाहिए और इसकी एक प्रति उस व्यक्ति को भी दी जानी चाहिए जिसके घर/इमारत की तलाशी ली गयी हो।
- तलाशी लेने वाले अधिकारी की भी , तलाशी शुरु करने से पहले , तलाशी ली जा सकती है ।
- कोई पुरुष किसी महिला की शारीरिक तलाशी नहीं ले सकता है, लेकिन वह महिला के घऱ या कारोबार के स्थान की तलाशी ले सकता है ।
जमानत का अधिकार क्या है
- जमानत गिरफ्तार व्यक्ति को कुछ शर्तों पर पुलिस या न्यायिक अभिरक्षा से मुक्त करने की अनुमति है ।
- अगर अपराध गैर-जमानती नहीं है तो पुलिस को गिरफ्तार व्यक्ति को जमानत पर छोड़ना ही होगा।
- अगर पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट पर्याप्त समझे तो व्यक्ति को निजी मुचलके या बंध-पत्र पर भी छोड़ा जा सकता है ।
- जमानत और मुचलके पर रिहा व्यक्ति को जब भी अफसर या अदालत तलब करे, हाजिर होना होगा।
जमानतदार कौन होते हैं
जमानतदार वे व्यक्ति होते हैं जो मुक्त किए गए व्यक्ति की आवश्यकतानुसार थाने या न्यायालय में उपस्थित प्रत्याभूत करते हैं । अगर मुक्त किया गया व्यक्ति पुलिस थाने या न्यायालय में उपस्थित नहीं होता है तो उसे वह रकम अदा करने के लिए समर्थ होना चाहिए, जिसके लिए वह जमानतदार है।
अग्रिम जमानत का अधिकार
यदि किसी व्यक्ति को यह विश्वास है कि उसे किसी गैर-जमानती अपराध के अभियोग में गिरफ्तार किया जा सकता है, तो वह इस धारा के अधीन निर्देश के लिए उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय को आवेदन कर सकता है। यदि न्यायालय ठीक समझे तो ऐसी गिरफ्तारी की स्थति में उसे जमानत पर छोड़ा जा सकता है ।
अग्रिम जमानत देने की शर्तें क्या हैं
- व्यक्ति पुलिस अधिकारी द्वारा पूछे जाने वाले प्रति प्रश्नों का उत्तर देने के लिए जब भी जरुरत होगी, वह उपलब्ध होगा।
- अपराध की जांच के दौरान पुलिस की पूछताछ में व्यक्ति को अपनी जानकारी की बातें सही-सही बताते हुए पुलिस के साथ सहयोग करना चाहिए।
- यदि संभव हो तो अपराध का सुराग भी पुलिस को देना चाहिए और जुबानी पूछताछ का उचित जवाब देना चाहिए।
- वह उस मामले के तथ्यों से अवगत किसी व्यक्ति को न्यायालाय या किसी पुलिस अधिकारी के समक्ष ऐसे तथ्यों को प्रकट ना करने के लिए मनाने के लिए, प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष रुप से उसे कोई उत्प्रेरणा, धमकी या वचन नहीं देगा।
- वह व्यक्ति ऩ्यायालय की पूर्व अनुज्ञा (आदेश) के बिना भारत नहीं छोड़ेगा।
ऐसी अन्य शर्तें, जो धारा 437 की उपधारा (3) के अधीन ऐसे अधिरोपित की जा सकती हैं मानो उस धारा के अधीन जमानत मंजूर की गयी है ।
- ऐसे अभियोग पर पुलिस थाने में पुलिस अधिकारी द्वारा वारंट के बिना गिरफ्तारी के समय या जब वह ऐसे अधिकारी की अभिरक्षा में है, तब किसी समय जमानत देने के लिए तैयार है, तो उसे जमानत पर छोड़ दिया जायेगा।
- यदि ऐसे अपराध का संज्ञान करने वाला मजिस्ट्रेट यह विनिश्चय करता है कि उस व्यक्ति के विरुद्ध प्रथम बार ही वारंट जारी किया जाना चाहिए तो वह उपधारा (क) के अधीन न्यायालय के निर्देश के अनुरुप जमानती वारंट जारी करेगा।
- न्यायालय मुकदमों के विभिन्न पहलुओं को देखते हुए शर्तों या बिना शर्त के अग्रिम जमानत मंजूर या नामंजूर कर सकती है।
- व्यक्ति को न तो किसी लिखित बयान पर दस्तखत करना जरुरी है, न ही वे सब बातें लिखकर देनी होती हैं जो उसने जुबानी बताई हैं ।
पुलिस हिरासत
- अगर कोई पुलिसकर्मी हिरासत में किसी व्यक्ति को सताता है या यातना देता है तो उस व्यक्ति को पुलिसकर्मी की पहचान कर उसके खिलाफ आपराधिक आरोप दर्ज करने चाहिए
- अगर हिरासत मे महिला के साथ बलात्कार तथा यौन संबंधी अन्य दुर्व्यवहार होता है तो उसे तुरंत डॉक्टरी जांच की मांग करनी चाहिए तथा मजिस्ट्रेट से शिकायत करनी चाहिए।
- किसी महिला को केवल महिलाओं वाले लॉक अप में रखा जाना चाहिए।
- अगर किसी थाने में ऐसी व्यवस्था नहीं है तो हिरासत में ली गयी महिला को मांग करनी चाहिए कि उसे ऐसे थाने में भेजा जाए जहां महिलाओं के लिए लॉक अप हो।
उच्चतम न्यायालय के निर्देश
- गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी गिरफ्तारी औऱ हिरासत में लिए जाने की सूचना अपने मित्र, संबंधी या किसी अन्य व्यक्ति को देने का अधिकार है ।
- गिरफ्तार करने वाले अधिकारी को किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर थाने ले जाते समय उसे सूचना देने के अधिकार की अवश्य जानकारी देनी चाहिए
- जिस व्यक्ति को गिरफ्तार किए जाने वाले व्यक्ति ने अपनी गिरफ्तारी की जानकारी दी है , उसका नाम पुलिस डायरी में दर्ज किया जाना चाहिए।
अभियुक्त की डॉक्टरी जांच-
- एसआई रैंक या उसके ऊपर का पुलिस अधिकारी अदालत में दरख्वास्त देकर अभियुक्त का डॉक्टरी जांच करवा सकता है। ताकि उस डॉक्टरी सर्टिफिकेट को वह साक्ष्य के रुप में इस्तेमाल कर सके।
- अभियुक्त स्वयं भी अपनी डॉक्टरी जांच के लिए अदालत को प्रार्थना-पत्र दे सकता है, ताकि वह साबित कर सके कि उसके साथ पुलिस द्वारा ज्यादती या मारपीट तो नहीं की गयी है।
महिला अभियुक्त के अधिकार-
- महिला पुलिस की ही हिरासत में रखने का अधिकार।
- महिला डॉक्टर द्वारा ही डॉक्टरी जांच का अधिकार।
- किसी अपराध में पूछताछ के लिए सूर्यास्त के बाद या सूर्योदय के पहले किसी भी पुलिस स्टेशन में नहीं बुलाने का अधिकार।
- किसी भी मामले में पूछताछ के दौरान महिला आरक्षी की उपस्थिति का अधिकार।
- गिरफ्तार महिला को महिला आरक्षी से ही तलाशी का अधिकार।
- घर की तलाशी के दौरान महिला अपराधी को घर से बाहर आने का समय पाने का अधिकार।
वारंट क्या है ?
- वारंट न्यायालय द्वारा जारी किया गया तथा न्यायालय के पीठासीन अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित एक लिखित आदेश है।
- हर वारंट तब तक प्रवर्तन में रहेगा जब तक वह उसे जारी करने वाले न्यायालय द्वारा रद्द नहीं कर दिया जाता या जब तक वह निष्पादित नहीं कर दिया जाता है ।
जमानती वारंट क्या है?
- जमानती वारंट न्यायालय द्वारा किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए जारी किया गया वारंट है, जिसमें यह पृष्ठांकित है कि जमानत की शर्तें पूरी करने के बाद उसे जमानत दी जा सकती है । इस मामले में पुलिस जमानत देने की हकदार है , अगर गिरफ्तार व्यक्ति शर्तें पूरी करे।
गैरजमानती वारंट क्या है ?
- गैरजमानती वारंट किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए न्यायालय द्वारा जारी वारंट है । इस मामले में पुलिस अधिकारी जमानत देने के लिए प्राधिकृत नहीं है । जमानत प्राप्त करने के लिए गिरफ्तार व्यक्ति को सम्बद्ध न्यायालय में आवेदन करना होगा।
बिना वारंट के गिरफ्तारी
- अभियुक्त पर संज्ञेय अभियोग हो या उसके खिलाफ ठोस शिकायत की गयी या ठोस जानकारी मिली हो या अपराध में उसके शामिल होने का ठोस शक हो,
- अभियुक्त के पास सेंध लगाने का कोई औजार पकड़ा जाए और वह ऐसे औजार के अपने पास होने का समुचित कारण नहीं बता सके,
- अभियुक्त के पास ऐसा सामान हो जिसे चोरी का समझा जाने के कारण हो अथवा जिस व्यक्ति पर चोरी करने या चोरी के माल खरीद-फरोख्त करने का शक करना वाजिब लगे।
- अभियुक्त घोषित अपराधी हो ,
- अभियुक्त किसी पुलिस अधिकारी के कर्तव्य पालन में बाधा पहुंचाए,
- अभियुक्त पुलिस/कानूनी हिरासत से फरार हो जाए,
- अभियुक्त के खिलाफ पक्का संदेह हो कि वह सेना का भगोड़ा है,
- अभियुक्त छोड़ा गया अपराधी हो, लेकिन उसने फिर कानून तोड़ा हो,
- अभियुक्त संदेहास्पद चाल-चलन का हो या आदतन अपराध करने वाला हो,
- अभियुक्त पर असंज्ञेय अभियोग हो और वह अपना नाम-पता नहीं बता रहा हो।
गिरफ्तारी के लिए मजिस्ट्रेट का वारंट
- व्यक्ति को किसी भी मामले में गिरफ्तार करने के दौरान उसका अपराध तथा गिरफ्तारी का आधार बताया जाना चाहिए।
- ड्यूटी पर मौजूद जूनियर अधिकारी द्वारा गिरफ्तार किए जा रहे व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के आदेश के कारण को बताना होगा और अगर वह व्यक्ति अपनी गिरफ्तारी के आदेश को देखना चाहता है तो वह आदेश भी दिखाया जाएगा।
- उसे यह भी बताया जाना चाहिए कि उस अभियोग पर उसे जमानत पर छोड़ा जा सकता है या नहीं ।
- गिरफ्तारी के समय व्यक्ति पुलिस से वकील की मदद लेने की इजाजत मांग सकता है । उसके मित्र, संबंधी भी उसके साथ थाने तक जा सकते हैं ।
- अगर व्यक्ति गिरफ्तारी का प्रतिरोध नहीं कर रहा हो तो गिरफ्तारी के समय पुलिस उससे दुर्व्यवहार नहीं कर सकती है, ना ही मारपीट कर सकती है ।
- अगर वह पुराना अपराधी नहीं है या उसके हथकड़ी नहीं लगाने पर भाग जाने का खतरा नहीं है , तो गिरफ्तार किए जाने वाले व्यक्ति को हथकड़ी नहीं पहनाई जा सकती है ।
- अगर किसी महिला को गिरफ्तार किया जाना है , तो पुलिस का सिपाही उसे छू तक नहीं सकता है ।
- गिरफ्तारी के तुरंत बाद व्यक्ति को थाने के प्रभारी अथवा मजिस्ट्रेट के पास लाया जाना चाहिए।
- किसी भी स्थिति में , गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना चाहिए।( इसमें गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट के पास लाए जाने का समय शामिल नहीं है)
- किसी भी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना, 24 घंटे से ज्यादा समय तक पुलिस हिरासत में नहीं रखा जा सकता है।
- गिरफ्तार व्यक्ति डॉक्टर द्वारा अपने शरीर की चिकित्सा परीक्षण की मांग कर सकता है ।
अपराधिक प्रकरण में समन-
- किसी भी अपराधिक प्रकरण में समन रजिस्टर्ड डाक से अथवा अखबार में प्रकाशन के माध्यम से तामील नहीं कराया जा सकता। अपराधिक प्रकरणों में अभियुक्त की उपस्थिति व्यक्तिगत रूप से आवश्यक होती है, इस कारण उसे व्यक्तिगत रूप से तामील कराया जाना आवश्यक है।
- यदि समन एक बार तामील हो भी गया और अभियुक्त पेशी पर उपस्थित नहीं हुआ तो जमानती या गैर जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी करना होगा। उसकी तामील भी व्यक्तिगत रूप से ही करानी पड़ेगी।
गिरफ्तारी के कानून
- पुलिस किसी भी व्यक्ति पर अपराध का आरोप होने पर ही उसे गिरफ्तार कर सकती है । केवल शिकायत अथवा शक के आधार पर किसी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है ।
न्यायालय का समन
- समन न्यायालय द्वारा जारी लिखित आदेश है । जिसके द्वारा न्यायालय किसी विवाद या आरोप से संबद्ध प्रश्नों का उत्तर देने के लिए किसी व्यक्ति को न्यायालय में उपस्थिति होने के लिए बाध्य कर सकता है ।
- अगर व्यक्ति समन स्वीकार करने से मना करे या न्यायालय के समक्ष अनुपस्थित हो तो न्यायालय गिरफ्तारी का वारंट जारी कर सकता है ।
एफआईआर न दर्ज करने पर शिकायत
देशभर में लोगों की ये शिकायतें आम हैं कि पुलिस उनकी शिकायत नहीं लेती है, या फिर एफआईआर दर्ज नहीं करती है। यदि उसने शिकायत ले भी ली और एफआईआर दर्ज भी कर ली तो समुचित कारर्वाई नहीं करती है।
पुलिस FIR दर्ज न करे तो क्या करें
इस समस्या को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि यदि पुलिस आपकी एफआईआर दर्ज करने से इंकार करे तो आप सम्बंधित शिकायत के साथ सिटी मजिस्ट्रेट से संपर्क करें।
FIR पर सर्वोच्च न्यायालय का आदेश
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि आम लोगों को चाहिए कि यदि उनकी एफआईआर दर्ज नहीं हो रही है तो सीआरपीसी कि धारा 154(3) के तहत उन्हें पहले पुलिस अधीक्षक या सेक्शन 36 में वर्णित अन्य पुलिस अधिकारी के पास जाना चाहिए।
यदि फिर भी एफ आई आर दर्ज न हो तो सीआरपीसी कि धारा 156(3) के तहत सिटी मजिस्ट्रेट के पास जाए, न कि धारा 482 के तहत सम्बंधित हाई कोर्ट के पास जाएं। हाईकोर्ट मामले को सुनने से मना कर सकती है।
आम लोग यदि चाहें तो धारा 200 के तहत मजिस्ट्रेट के पास आपराधिक शिकायत भी दर्ज करा सकते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि 14/07/2008 के आदेश को सुप्रीम कोर्ट की वेबसाईट पर भी अपलोड किया जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा आम लोग उपरोक्त निर्देश को पढ़ें और अपने क्षेत्र के पुलिस स्टेशन में अपने अधिकारों का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करें।
सिटी मजिस्ट्रेट पूर्णतः सतर्क रहे एवं पुलिस अधिकारी द्वारा किसी भी तरह की अनुपालना में कमी की शिकायत को गम्भीरता से लेते हुए न सिर्फ उस अधिकारी के विरुद्ध कारर्वाई करें बल्कि सजा के तौर पर जेल भी भेज सकते हैं।
अदालत ने 14/07/2008 के आदेश में व्यवस्था दी थी कि देश के सभी राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश के मुख्य सचिव एवं सभी पुलिस महानिदेशक यह सुनिश्चित करेंगे कि देश के सभी पुलिस स्टेशन में लोगों की शिकायत आते ही उनकी एफआईआर दर्ज की जाये,
यदि एफआईआर दर्ज नहीं कि गई तो इसकी शिकायत सम्बंधित सिटी मजिस्ट्रेट को करें, जो कि न सिर्फ एफआईआर दर्ज करने का आदेश जारी करेंगे बल्कि आदेश जारी होने के 24 घंटे के अंदर एफआईआर दर्ज होना भी सुनिश्चित करेंगे,
यदि ऐसा नहीं हुआ तो मजिस्ट्रेट सम्बंधित पुलिस अधिकारी को अवमानना के तहत सजा देंगे जो कि सर्विस रूल के तहत बर्खास्तगी के अलावा जेल यात्रा तक कुछ भी हो सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने 12/11/2013 को अपने फ़ाइनल आदेश में कहा कि- किसी भी पुलिस स्टेशन की डायरी एक महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है, जिसमें आम लोगों की सभी शिकायतें दर्ज कि जानी चाहिए।
शिकायत दर्ज होने के बाद उस पर प्राथमिक जांच हो कि उसमें कौन सा अपराध बनता है। अगर संज्ञेय अपराध परिलक्षित होता है तो धारा 154 के तहत एफआईआर दर्ज कर उसकी एक कॉपी शिकायतकर्ता को मुहैया कराई जाए।
अगर संज्ञेय अपराध नहीं है तो प्राथमिक जांच करके शिकायतकर्ता को एफआईआर दर्ज नहीं होने के कारणों सहित सूचित करते हुए शिकायत बंद कर दी जा सकती है।
संज्ञेय अपराध की शिकायत मिलने पर एफआईआर दर्ज नहीं करने पर सम्बंधित अधिकारी के खिलाफ कारर्वाई सुनिश्चित कि जाए।
इसलिए यदि पुलिस अधिकारी आपकी शिकायत लेने या एफआईआर दर्ज करने से मना करे तो आप निडर होकर उसके खिलाफ सिटी मजिस्ट्रेट से शिकायत करें और पुलिस थाने में अपनी एफआईआर दर्ज कराएं।
एफआईआर दर्ज ना होने पर चीफ मेट्रोपालिटन मजिस्ट्रेट या चीफ च्यूडिशियल मजिस्ट्रेट से शिकायत(परिवाद) :-
- जब पुलिस अधिकारी एफआईआर के आधार पर कार्यवाही नहीं करता है, तब व्यथित व्यक्ति उस मजिस्ट्रेट को शिकायत कर सकता है , जिसे उस अपराध पर संज्ञान लेने की अधिकारिता है ।
- अगर एफआईआर दर्ज न हो तो पीड़ित पक्ष इलाके के अडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मैजिस्ट्रेट या चीफ मेट्रोपॉलिटन मैजिस्ट्रेट के सामने सीआरपीसी की धारा -156 (3) के तहत शिकायत कर सकता है। हर जिला अदालत में एक अडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मैजिस्ट्रेट बैठता है।
- दिल्ली से बाहर के मामले में चीफ जूडिशियल मैजिस्ट्रेट ( सीजेएम ) के सामने शिकायत की जा सकती है। इसके बाद अदालत मामले को संबंधित मैजिस्ट्रेट को रेफर करती है। इसके बाद मैजिस्ट्रेट के सामने शिकायती अपना पक्ष रखता है और उससे संतुष्ट होने के बाद मैजिस्ट्रेट एफआईआर दर्ज करने का आदेश देता है। अगर मैजिस्ट्रेट ने अर्जी खारिज कर दी तो उस अदालती फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अर्जी दाखिल की जा सकती है।
प्रथम सूचना रिपोर्ट(एफआईआऱ)
पुलिस थाने या चौकी में दर्ज की गयी ऐसी पहली अपराध की रिपोर्ट को प्रथम सूचना रिपोर्ट या एफआईआर कहा जाता है।
- हर व्यक्ति अपने तरीके से अपराध के उस समय ज्ञात ब्योरे देते हुए रिपोर्ट लिखवा सकता है ।
- पुलिस इस एफआईआऱ को अपने रिकॉर्ड में दर्ज कर लेगी और पावती के रुप में एक प्रति रिपोर्ट दर्ज कराने वाले को देगी।
- पुलिस सभी प्रकार के अपराधों की रिपोर्ट दर्ज करती है , लेकिन केवल संज्ञेय अपराधों के मामलों में ही पुलिस स्वयं जांच पड़ताल कर सकती है ।
- असंज्ञेय अपराधों के मामलों में पुलिस पहले मामले को मजिस्ट्रेट को पेश करती है और उससे आदेश प्राप्त होने के बाद ही वह जांच-पड़ताल शुरु कर सकती है ।
- संज्ञेय अपराधों में गंभीर किस्म के अपराध आते हैं जैसे कि हत्या , रेप , डकैती , लूट आदि। सीआरपीसी की धारा-154 के तहत संज्ञेय अपराध में पुलिस एफआईआर दर्ज करना जरूरी है।
- अगर थाने में मौजूद पुलिस कर्मचारी/अधिकारी रिपोर्ट लिखने से मना कर दे तो शिकायतकर्ता उस क्षेत्र के पुलिस अधीक्षक या उप पुलिस अधीक्षक को डाक से रिपोर्ट भेज सकता है ।
- अगर रिपोर्ट लिखवाने वाला/वाली अनपढ़ हो तो ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारी उसके बताए विवरण के मुताबिक उसकी ओर से रिपोर्ट लिखनी चाहिए और उसे पढ़कर सुनानी चाहिए।
- ऐसी एफआईआर को सुनकर शिकायतकर्ता करने वाला/वाली रिपोर्ट पर अपने अंगूठे का निशान लगा सकता/सकती है।
- अगर शिकायतकर्ता को लगता है कि रिपोर्ट में तथ्य ठीक नहीं लिखे गये हैं तो वह रिपोर्ट लिखने वाले पुलिस अधिकारी से आवश्यक संशोधन करने को कह सकता है ।
एफआईआर में निम्नलिखित विषय हों
- अभियुक्त का नाम और पता हो
- अपराध होने का दिन,स्थान तथा समय हो
- अपराध करने का तरीका तथा उसके पीछे नीयत आदि हो
- साक्षी का परिचय हो
- अपराध से सम्बद्ध सभी विशेषताएं हों
पुलिस कौन है?
पुलिस एक ऐसे व्यक्तियों का समूह है जिनका चयन और प्रशिक्षण कानून और व्यवस्था तथा जनता की सुरक्षा और सेवा के लिए किया जाता है ।
पुलिस तानाशाह नहीं है, बल्कि हमारी नौकर है और हमारी सुरक्षा के लिए उसे नियुक्त किया गया है। जनता की रक्षा करना और अन्य अपराधों के बारे में जनता में समझ पैदा करना और उनके रोकथाम के लिए प्रभावी उपाय करना पुलिस की कानूनी जिम्मेदारी है। इससे अलग अगर पुलिस कुछ भी करती है तो उस पर सवाल उठाने चाहिए। पुलिस बेगुनाहों को गुनाहगार बनाने के लिए नहीं बल्कि बेगुनाहों को बचाने के लिए हैं।
पुलिस के काम
- कानून और व्यवस्था बनाए रखना
- अपराध का निवारण करना
- अपराध की जांच करना
- संज्ञेय अपराध करने वाले अभियुक्त की गिरफ्तारी करना
- किसी व्यक्ति के जान, माल औऱ आजादी की सुरक्षा करना
- किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किए गए हर कानूनी आदेश और वारंट को निष्पादित करना
पुलिस का प्रशासनिक ढांचा
- एसएचओ (पुलिस थाने का इंचार्ज होता है )
- डीएसपी (सब डिविजन का पुलिस अधिकारी होता है जबकि मेट्रोपोलिटन शहरों में असिस्टेंट कमिश्नर कहा जाता है ,एसएचओ के काम की देखरेख करता है)
- एसपी (एक जिले की कानून और व्यवस्था में डीएम की मदद करता है)
- एसएसपी(एक जिले के पुलिस प्रशासन का इंचार्ज होता है , जो जिला मजिस्ट्रेट के मार्गदर्शन और पर्यवेक्षण में काम करता है, जबकि मेट्रोपोलिटन शहरों में डिप्टी कमिश्नर इंचार्ज होता है, इसकी मदद असिस्टेंट कमिश्नर करता है )
- डीआईजीपी (एक राज्य के के तीन चार जिलों का इंचार्ज होता है )
- आईजीपी या डीजीपी (राज्य स्तर के पुलिस प्रशासन का इंचार्ज होता है)
संघ शासित पुलिस प्रशासन
- संघ शासित क्षेत्र में पुलिस प्रणाली की देखरेख केंद्रीय सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी द्वारा किया जाता है । ये अधिकारी आईजीपी के सारे अधिकारों का इस्तेमाल कर सकता है ।
पैन कार्ड क्या है?
पैन - (परमानेंट आकाउंट नंबर) कार्ड एक फोटो पहचान पत्र है, जिसमें हर कार्डधारी के लिए 10 अंकों वाला एक अल्फा न्यूमेरिक नंबर आवंटित किया जाता है । इस नंबर को भारत सरकार का वित्त मंत्रालय जारी किया जाता है ।
पैन का इस्तेमाल क्या है
- पैन नंबर को आयकर रिटर्न दाखिल करने के दौरान भरना जरुरी है ।
- इसके अलावा पैन का इस्तेमाल बैंक खाता खुलवाने , पासपोर्ट बनवाने , ट्रेन में ई-टिकट के साथ यात्रा करते समय पहचान पत्र के रुप में किया जा सकता है ।
- एक बैंक से दूसरे खाते में 50,000 रुपए या उससे अधिक की राशि निकलने या जमा करने या हस्तांतरित करने पर पैन नंबर की जरुरत होती है।
- टीडीएस (टैक्स डिडक्शन एट सोर्स) जमा करने और वापस पाने के लिए पैन नंबर का उल्लेख करना जरुरी होता है ।
पैन कार्ड पाने की योग्यता क्या है
- कोई भी व्यक्ति , फर्म या संयुक्त उपक्रम पैन कार्ड के लिए आवेदन कर सकता है । इसके लिए कोई न्यूनतम या अधिकतम उम्र सीमा नहीं है।
पैन कार्ड के लिए जरुरी दस्तावेज
- हाल ही में खिंचवाई गयी पासपोर्ट आकार की दो रंगीन फोटो
- 106 रुपए(कर सहित) का डिमांड ड्रॉफ्ट/चेक/नेट बैंकिंग/ क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड से भुगतान
- व्यक्तिगत पहचान के प्रमाण की फोटोकापी
- निवास प्रमाणपत्र की फोटोकापी
व्यक्तिगत पहचान के लिए प्रमाणपत्र
- विद्यालय छोड़ने का प्रमाणपत्र
- मैट्रिक प्रमाणपत्र
- मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थान की डिग्री
- डिपोजिटरी खाता विवरण
- क्रेडिट कार्ड का विवरण
- बैंक खाते का विवरण
- पानी का बिल
- राशनकार्ड
- संपत्ति कर मूल्यांकन आदेश
- पासपोर्ट
- मतदाता पहचान पत्र
- ड्राइविंग लाइसेंस
- सांसद अथवा विधायक अथवा नगरपालिका पार्षद अथवा राजपत्रित अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित पहचान प्रमाण पत्र
निवास प्रमाण पत्र के लिए प्रमाण पत्र
- बिजली बिल
- टेलीफोन बिल
- डिपोजिटरी खाता विवरण
- क्रेडिट कार्ड का विवरण
- बैंक खाता विवरण/ बैंक पास बुक
- घर किराए की रसीद
- नियोक्ता का प्रमाण पत्र
- पासपोर्ट
- मतदाता पहचान पत्र
- संपत्ति मूल्यांकन आदेश
- ड्राइविंग लाइसेंस
- राशन कार्ड
- सांसद अथवा विधायक अथवा नगरपालिका पार्षद अथवा राजपत्रित अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित पहचान प्रमाण पत्र
- ऊपर उल्लिखित सभी प्रमाण पत्र इस्तेमाल के दौरान 6 महीने से ज्यादा पुराना नहीं होना चाहिए।
पैन कार्ड के लिए शुल्क का भुगतान
- पैन कार्ड के आवेदन के लिए 94 रुपए शुल्क का भुगतान करना होगा
- शुल्क का भुगतान डिमांड ड्रॉफ्ट, चेक या क्रेडिट कार्ड से कर सकते हैं
- डिमांड ड्रॉफ्ट या चेक एनएसडीएल-पैन के नाम से बना हो
- डिमांड ड्रॉफ्ट मुंबई में भुगतान हो, ड्रॉफ्ट के पीछे आवेदक का नाम और पावती संख्या लिखी होनी चाहिए
- चेक से भुगतान एचडीएफसी बैंक से भुगतान कर सकते हैं , जमा पर्ची पर NSDLPAN लिखा होना चाहिए
लाइसेंस प्राप्त करने की प्रक्रिया
1-मोटर वाहन लाइसेंस प्राप्त करने के लिए आपको अपने क्षेत्रीय आरटीओ में आवेदन करना होगा ।
2-लर्नर्स लाइसेंस के लिए आपको क्षेत्रीय आरटीओ में आवेदन करना होगा ।
3-आवेदन में पासपोर्ट आकार की फोटो, आयु, निवास प्रमाण, मेडिकल फिटनेस की घोषणा करना होगा ।
4-आवेदन के साथ ही निर्धारित शुल्क का भुगतान भी करना होगा ।
5-लाइसेंस प्राप्त करने वाले को लर्नर्स की परीक्षा भी देनी होगी ।
6-लर्नर्स की परीक्षा पास करने के बाद आपको लर्नर्स लाइसेंस जारी किया जायेगा ।
7-अगर आप लर्नर्स परीक्षा में असफल हो जाते हैं तो दोबारा आपको परीक्षा देने का मौका दिया जायेगा ।
8-स्थायी लाइसेंस प्राप्त करने के लिए आपके पास वैध लर्नर्स लाइसेंस होना जरुरी है ।
9-स्थायी लाइसेंस के लिए लर्नर्स लाइसेंस जारी होने के 30 दिनों के बाद और 180 दिन के अंदर आवेदन करना होता है ।
10-लाइसेंस प्राप्त करने के लिए आपको वाहन के सिस्टम, ड्राइविंग, यातायात नियमों के बारे में अच्छी जानकारी होनी चाहिए।
11-स्थायी लाइसेंस को प्राप्त करने के लिए आपको वाहन चलाने का टेस्ट देना होगा । जिसके लिए आपको अपना वाहन साथ में लाना होगा।
12-इस टेस्ट को पास करने के बाद आपको स्थायी लाइसेंस जारी कर दिया जायेगा ।
मोटर वाहन अधिनियम 1988
इस अधिनियम के अधीन कोई भी व्यक्ति किसी सार्वजनिक स्थान में मोटर वाहन नहीं चला सकता है, जब तक कि उसके पास मोटर वाहन अधिनियम 1988 के अधीन जारी किया गया उसके पास वैध लाइसेंस न हो।
ड्राइविंग लाइसेंस के प्रकार
1-लर्नर्स लाइसेंस
मोटर वाहन लाइसेंस के लिए आवेदन करने पर आरटीओ आफिस सबसे पहले लर्नर मोटर वाहन लाइसेंस जारी करता है ।
2-स्थायी लाइसेंस
आरटीओ आफिस लर्नर्स लाइसेंस धारक को 1 महीने के बाद स्थायी मोटर वाहन लाइसेंस जारी करता है ।
लाइसेंस प्राप्त करने की योग्यता
1-स्थायी मोटर वाहन लाइसेंस प्राप्त करने के लिए लर्नर्स लाइसेंस प्राप्त करना बहुत जरुरी है ।
2-50 सीसी क्षमता औऱ बिना गियर वाले वाहन के लिए लर्नर्स लाइसेंस प्राप्त करने की योग्यता 16 साल (अगर आवेदक के माता-पिता या अभिभावक अपनी सहमति दें) है।
3-जबकि निजी मोटर वाहन चलाने के लिए स्थायी लाइसेंस प्राप्त करने की न्यूनतम आयु 18 साल है ।
4-20 साल का व्यक्ति लर्नर्स लाइसेंस प्राप्त करने के बाद वाणिज्यिक वाहन चलाने के लिए लाइसेंस प्राप्त कर सकता है ।
5-वाणिज्यिक वाहन चलाने वाले व्यक्ति को यातायात के नियमों की जानकारी होनी चाहिए।
नई दिल्ली। बिजली की कटौती से परेशान दिल्ली वालों के लिए राहत की खबर है। अब बिना बताए बिजली काटी तो बिजली कंपनियों को हर्जाना देना होगा। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा, ‘इससे बिजली वितरण कंपनियों की जिम्मेदारी तय होगी। छह महीने बाद स्थिति की समीक्षा की जाएगी और यदि वे अपना इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं सुधारते हैं तो हर्जाने में लगने की समयावधि घटाई जा सकती है’। दिल्ली सरकार के निर्देशानुसार दिल्ली विद्युत विनियामक आयोग (डीईआरसी) ने सोमवार को अपने नियमों में संशोधन लाया जो तत्काल प्रभाव से लागू है। इसके अनुसार यदि डिस्कॉम तय समय-सीमा में खराबी दुरुस्त नहीं कर पाती है या लोडशेडिंग की अवधि दो घंटे से ज्यादा होती है तो उन्हें हर्जाना देना होगा।
आपको बता दें कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बिजली विभाग के उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है, जिसके अंतर्गत बिना किसी पूर्व सूचना के बिजली कटौती होने पर निजी बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) को उपभोक्ताओं को हर्जाना देना होगा। इस नीति को अंतिम मंजूरी के लिए दिल्ली सरकार ने उपराज्यपाल अनिल बैजल के पास भेज दिया है। सरकार का दावा है कि इससे बिजली कंपनियों को उपभोक्ताओं के प्रति जवाबदेह बनाया जा सकेगा। नीति के मुताबिक अघोषित बिजली कटौती होने पर डिस्कॉम को एक घटे के अंदर बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी। ऐसा नहीं हुआ तो डिस्कॉम को पहले दो घटे की कटौती पर प्रत्येक उपभोक्ता को 50 रुपये प्रति घंटे के हिसाब से हर्जाना देना होगा। दो घंटे से अधिक की कटौती पर हर्जाना प्रति उपभोक्ता 100 रुपये प्रति घंटे के हिसाब से देना होगा। एक दिन में शुरुआती पहले घटे में कटौती की स्थिति डिस्कॉम को हर्जाने की छूट रहेगी। अगर उसी उपभोक्ता को उसी दिन आगे भी कटौती की समस्या का सामना करना पड़ता है तो डिस्कॉम को पूरी कटौती का हर्जाना देना पड़ेगा।
बिजली कटौती का सामना करने वाले उपभोक्ता को बिजली कटौती की शिकायत एसएमएस, ई-मेल, फोन, मोबाइल एप और वेबसाइट के जरिये अपने नाम, कंज्यूमर अकाउंट (सीए) नंबर, मोबाइल नंबर इत्यादि जानकारियों के साथ करनी होगी। बिजली कंपनियों को शिकायत स्वीकार करने के साथ ही उसे सुलझाने के दिन और समय की सूचना देनी होगी। एक निश्चित समयावधि में उपभोक्ता के सीए नंबर में हर्जाना अपने आप पहुंच जाएगा और इसकी सूचना भी उपभोक्ता को मिल जाएगी। हर्जाना बिजली बिल में अधिकतम 90 दिनों में समायोजित करना होगा और ऐसा न किए जाने की शिकायत होने पर हर्जाना पांच हजार रुपए या पांच गुना हो सकता है।
अगर उपभोक्ता को बिजली वितरण कंपनी से हर्जाना स्वत: नहीं मिलता है तो वह दिल्ली विद्युत विनियामक आयोग (डीईआरसी) या उपभोक्ता शिकायत निवारण फोरम के पास शिकायत कर सकता है। शिकायत सही पाए जाने पर डिस्कॉम को संबंधित उपभोक्ता को पांच हजार रुपये या हर्जाने की पाच गुना राशि अधिक देनी होगी। अगर अघोषित बिजली कटौती से उपभोक्ताओं का एक समूह प्रभावित होता है तो बिजली कंपनियों को ऐसे प्रभावित लोगों का अपने दस्तावेजों से पता लगाना होगा। ऐसे हर उपभोक्ता के सीए नंबर में निश्चित समयावधि के भीतर हर्जाना देना होगा।
नई दिल्ली। आरटीओ के चक्कर लगाने वाले वाहन मालिकों के लिए सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की तरफ से एक खुशखबरी है। वर्ष 1 जनवरी, 2019 से गाड़ी में हाई सिक्यूरिटी नंबर प्लेट फैक्ट्री से ही लग कर आएगी। इसके लिए सरकार केंद्रीय मोटर वाहन नियमावली के अलावा 2001 के सिक्यूरिटी नंबर प्लेट आदेश में संशोधन करने जा रही है। इस संबंध में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की ओर से मसौदा अधिसूचना जारी की गई है। इस मसौदे के अनुसार 1 जनवरी, 2019 से ग्राहकों को बेचे जाने वाले सभी मोटर वाहनों में सिक्यूरिटी नंबर प्लेट निर्माता के यहां से लगकर आएंगे। जिन डीलरों के पास बिना हाई सिक्यूरिटी नंबर प्लेट वाले वाहनों का पुराना स्टॉक होगा उन्हें वाहन निर्माताओं द्वारा सिक्यूरिटी प्लेटें दी जाएंगी और वे भी 1 जनवरी, 2019 से वाहनों को सिक्यूरिटी प्लेट लगाकर ही ग्राहकों को बेचेंगे। खास बात यह है कि पांच वर्ष के बजाय 15 वर्षो तक नंबर प्लेट के खराब न होने की गारंटी के साथ क्वालिटी में सुधार सुनिश्चित किया जाएगा। अभी वाहनों में नंबर प्लेट लगाने का जिम्मा आरटीओ के पास है जो हाई सिक्यूरिटी नंबर प्लेट बनाने वाली कंपनियों के माध्यम से इसे अंजाम देता है।
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के इस निर्णय से सिक्यूरिटी नंबर प्लेट की व्यवस्था स्वत: पूरे देश में लागू हो जाएगी। गौतलब है कि अभी तक उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में सिक्यूरिटी नंबर प्लेट की व्यवस्था लागू नहीं हुई है। जबकि दिल्ली में यह व्यवस्था पहले से ही लागू हो चुकी है।
आपको बता दें कि, हाई सिक्यूरिटी रजिस्ट्रेशन प्लेट एल्यूमिनीयम का बना हुआ एक प्लेट होगा। इस नंबर प्लेट पर एक होलोग्राम लगा होगा जिसपर एक चक्र बना होगा। यह होलोग्राम एक ऐसा स्टीकर होगा जिसपर वाहन के इंजन और चेसिस नंबर इंगित होगा। सबसे खास बात यह है कि यह होलोग्राम जल्द नष्ट होने वाली नहीं होगा। इसके अलावा हर प्लेट पर 7 अंकों का एक यूनीक लेजर कोड होगा जो कि हर वाहन के नंबर प्लेट पर अलग-अलग होगा। इस नंबर प्लेट पर आपके वाहन का जो रजिस्टेशन नंबर होगा वो सबसे खास होगा। जिसे हटाने या फिर मिटाने में पसीने छूट जायेंगे। इस नंबर प्लेट पर आपके वाहन का जो रजिस्ट्रेशन नंबर लिखा गया होगा वो किसी पेंट या फिर स्टीकर आदि से नहीं लिखा होगा। नंबर को आपके प्लेट पर प्रेसर मशीन से लिखा गया होगा जो कि प्लेट पर उभरा हुआ दिखेगा। यह कार्य आरटीओ द्वारा किया जायेगा इस वजह से जो अंक और अक्षर उभरेगा उस पर भी आईएनडी दिखेगा। इस कार्य में कोई जालसाजी नहीं हो सकती है क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपने मन से न तो इन नंबरों में कोई फेर बदल कर सकता है और न ही उन्हे मिटा सकता है।